विभिन्न ऋण व उनके उपाय

विभिन्न ऋण व उनके उपाय

लाल किताब में वर्णित, पूर्व जन्मानुसार जातक के ऊपर विभिन्न ऋण व उनके उपाय इस प्रकार हैं।
स्वऋण- जन्मकुंडली के पंचम भाव में पापी ग्रहों के होने से स्वऋण होता है। इसके प्रभाववश जातक निर्दोष
होते हुए भी दोषी माना जाता है। उसे शारीरिक कष्ट मिलता है, मुकदमे में हार होती है और कार्यों में संघर्ष करनापड़ता है। इससे मुक्ति के लिए जातक को अपने सगे संबंधियों से बराबर धन लेकर उस राशि से यज्ञ करना चाहिए।
मातृ ऋण- चतुर्थ भाव में केतु होने से मातृ ऋण होता है। इस ऋण से ग्रस्त जातक को धन हानि होती है, रोग
लग जाते हैं, ऋण लेना पड़ता है। प्रत्येक कार्य में असफलता मिलती है। इससे मुक्ति के लिए जातक को खून
के संबंधियों से बराबर चांदी लेकर बहते पानी में बहानी चाहिए।
सगे संबंधियों का ऋण- प्रथम व अष्टम भाव में बुध व केतु हों, तो यह ऋण होता है। जातक को हानि होती
है, संकट आते रहते हैं और कहीं सफलता नहीं मिलती। इससे मुक्ति के लिए परिवार के सदस्यों से बराबर धन
लेकर किसी शुभ कार्य हेतु दान देना चाहिए।
बहन ऋण- तृतीय या षष्ठ भाव में चंद्र हो तो बहन ऋण होता है जिससे जातक के जीवन में आर्थिक परेशानी
आती है, संघर्ष बना रहता है व सगे संबंधियों से सहायता नहीं मिलती। इससे मुक्ति के लिए जातक को परिवार
के सदस्यों से बराबर पीले रंग की कौडियां लेकर उन्हें जलाकर उनकी राख को पानी में प्रवाहित करना चाहिए।
पितृ ऋण- द्वितीय, पंचम, नवम या द्वादश भाव में शुक्र, बुध या राहु हो तो पितृ ऋण होता है इस ऋण से ग्रस्त
व्यक्ति को वृद्धावस्था में कष्ट मिलते हैं, धन हानि होती है और आदर सम्मान नहीं मिलता। इससे मुक्ति के लिए
परिवार के सदस्यों से बराबर धन लेकर किसी शुभ कार्य के लिए दान देना चाहिए।
स्त्री ऋण- द्वितीय या सप्तम भाव में सूर्य, चंद्र या राहु हो तो स्त्री ऋण होता है। इस ऋण के फलस्वरूप जातक
को अनेक दुख मिलते हैं और उसके शुभ कार्यों में विघ्न आता है। इससे मुक्ति के लिए परिवार के सदस्यों से बराबर
धन लेकर गायों को भोजन कराना चाहिए।
असहाय का ऋण- दशम व एकादश भाव में सूर्य, चंद्र या मंगल हो तो यह ऋण होता है। इस ऋण से ग्रस्त
जातक को अनेक परेशानियों का सामना करना पड़ता है। उसकी उन्नति में बाधाएं आती हैं और हर काम में
असफलता मिलती है। इससे मुक्ति के लिए परिवार के सभी सदस्यों से बराबर धन लेकर मजदूरों को भोजन कराना
चाहिए।
अजन्मे का ऋण- द्वादश भाव में सूर्य, शुक्र या मंगल हो तो अजन्मे का ऋण होता है जो जातक इस ऋण से
ग्रस्त होता है उसे जेल जाना पड़ता है, चारों तरफ से हार मिलती है और शारीरिक चोट पहंुचती है। इससे मुक्ति
के लिए परिवार के सदस्यों से एक-एक नारियल लेकर जल में बहाना चाहिए।
ईश्वरीय ऋण- षष्ठ भाव में चंद्र या मंगल हो तो ईश्वरीय ऋण होता है। इस ऋण के फलस्वरूप जातक का
परिवार नष्ट होता है, धन हानि होती है और बंधु बांधव विश्वासघात करते मिलते हंै इसके लिए परिवार के सदस्यों
से बराबर धन लेकर कुŸाों को भोजन कराना चाहिए।

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