कालसर्प दोष

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वर्त्तमान समय में ९०% लोग कालसर्प,पितृदोष,राहु-केतु एवं शनि से पीड़ित होने के कारण असफल  एवं दुःखी है|कही आपके दुर्भाग्य और दुःख का कारण कालसर्प तो नहीं ? दुःख,दुर्भाग्य और असफलता तथा कारण-निवारण एवं उपचार हेतु शत्-प्रतिशत सही जन्म-कुण्डली बनवाएँ |

अग्रे राहुरधः केतुः सर्वे मध्यगताः ग्रहाः |
योगाऽयं कालसर्पाख्यो शीघ्रं  तं तु विनाशय ||

आगे राहु हो एवं नीचे केतु मध्य में सभी (सातों) ग्रह विद्यमान हों, तो कालसर्प योग बनता है |अतः इस योग से ग्रसित जातकों के लिए आवश्यक है,कि वे इस कालसर्प योग का निदान करा लें |जिससे की कुण्डली के शुभ योगो के फल पूण॔तया  मिलते रहे |

कालसर्प योग मुख्यत: द्वादाश प्रकार के होते हैं | वे हैं :-
1. अनन्त |2. कुलिक |3. वासुकी |4. शड्खपाल | 5. पद्म  |6. महापद्म |7. तक्षक | 8.कर्कोटक |9. शड्खचूड |10. घातक |11. विषधर |12. शेषनाग |
यह योग उदित अनुदित भेद  से दो  प्रकार के होते हैं राहु के मुख  में सभी सातों ग्रह ग्रसित हो जायें,तो उदित गोलार्द्ध नामक योग बनता है,एवं राहु की पृष्ट में यदि सभी ग्रहों तो अनुदित गोलार्द्ध नामक योग बनता है |

                  यदि लग्न कुण्डली में सभी सातों ग्रह राहु से केतु के मध्य में हों लेकिन अँशानुसार कुछ ग्रह राहु केतु की धुरी से बाहर  हों तो आंशिक काल सर्प योग कहलाता है|यदि कोई एक ग्रह  राहु-केतु की धुरी से बहार हो तो भी आंशिक कालसर्प योग बनता है

                   यदि राहु से केतु तक सभी भावों में कोई न कोई ग्रह स्थित हों तो यह योग पूण॔ रूप से फलित होता है |यदि राहु-केतु के साथ सूर्य या चन्द्र हो तो यह योग अधिक प्रभावशाली  होता है| यदि राहु, सूर्य व चन्द्र तीनों एक साथ हों तो ग्रहण- कालसर्प योग बनता है | इसका फल हजार गुना अधिक हो जाता है|ऐसे जातक को कालसर्प की शान्ति करवाना अति आवश्यक होता है|

  काल सर्प योग का प्रभाव
इस योग में उत्पन्न जातक को मानसिक अशांति , धनप्राप्ति में बाधा , संतान अवरोध एवं गृहस्थी में प्रतिपल कलह के रूप में प्रकट होता है|प्राय:जातक को बुरे स्वप्न आते हैं|कुछ न कुछ अशुभ होने की आशंका मन में बनी रहती है|जातक को अपनी क्षमता एवं कार्य कुशलता का पूर्ण फल प्राप्त नहीं  होता है,कार्य अक्सर देर से सफल होते है|अचानक नुकसान एवं प्रतिष्ठा की क्षति इस योग के लक्षण  हैं |

         जातक के शारीर में वात पित त्रिदोषजन्य असाध्य रोग अकारण उतपन होते हैं | ऐसे रोग जो  प्रतिदिन क्लेश(पीड़ा) देते हैं तथा औषधि लेने पर भी ठीक नहीं होते हों, कालसर्प योग के कारण होते हैं |

          कालसर्प के योग के औपचारिक उपाय के द्वारा इन कष्टों से राहत एवं छुटकारा प्राप्त किया  जा सकता है|जन्मपत्रिका के अनुसार जब- जब राहु एवं  केतु की महादशा,अन्तर्दशा आदि आती है ,तब तब यह योग असर दिखाता है|गोचर में राहु व केतु का जन्मकालिक राहु-केतु व् चन्द्र पर भ्रमण भी इस योग कॊ सक्रिय कर देता है|उस समय विशेष ध्यान देकर पूजा अर्चनादि  श्रद्धा विशवास के साथ करें,अवश्य लाभ होगा|कालसर्प योग सिद्धि ऑयल एवं यन्त्र के सम्मुख 43 दिन तक  चिरायु  सिद्धि आँयल(तेल)का दिया जलाने से भी इन कष्टों से राहत एवं छुटकारा प्राप्त किया जा सकता है |

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