नागपंचमी की पौराणिक एवं प्रामाणिक कथा

नागपंचमी की पौराणिक एवं प्रामाणिक कथा

नाग पंचमी क्या है?

नाग पंचमी हिन्दुओं का एक महत्वपूर्ण त्यौहार है। हिन्दू पंचांग में सावन माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी को नाग पंचमी के रूप में मनाया जाता है। इस दिन नाग देवता या सर्प की पूजा की जाती है और उन्हें दूध पिलाया जाता है। नागपंचमी के ही दिन अनेक गांव व कस्बों में कुश्ती का आयोजन होता है, जिसमें आसपास के पहलवान भाग लेते हैं। गाय, बैल आदि पशुओं को इस दिन नदी, तालाब में ले जाकर नहलाया जाता है।

नाग देवता की पूजा क्यों?

विविध समूहों की उपासना विधि में मौजूद फर्क के कारण होने वाले विवाद को यदि निकाल दिया जाए तो मानव मात्र वेदों के तेजस्वी और अलौकिक विचारों को स्वीकार करेगा। इस पर आर्यों की अखण्ड श्रद्धा थी। इसको सफल बनाने के लिए आर्यों ने अलग-अलग श्रेणियों में चलती विभिन्न देवताओं की पूजा को स्वीकार किया और अलग-अलग श्रेणियों को उन्होंने आत्मसात करके अपने में मिला लिया। इन विभिन्न पूजाओं को स्वीकार करने के कारण ही हमें नागपूजा प्राप्त हुई होगी, ऐसी संभावना है।

नाग देवता की पसंद

साँप को सुगंध बहुत ही भाती है। चंपा के पौधे से लिपटकर वह रहता है या तो चंदन के वृक्ष पर वह निवास करता है। केवड़े के वन में भी वह फिरता रहता है। उसे सुगंध प्रिय लगती है, इसलिए भारतीय संस्कृति को वह प्रिय है। प्रत्येक मानव को जीवन में सद्गुणों की सुगंध आती है, सुविचारों की सुवास आती है, वह सुवास हमें प्रिय होनी चाहिए।

नाग पंचमी की मुख्य कथा

एक समय की बात है, कालिया नाग का निवास यमुना नदी में होने के कारण उस नदी का पानी काले रंग का होने लगा था। कहा जाता है कि एक समय उस भयानक विषधर कालिया नाग के विष के कारण यमुना नदी विषाक्त हो चली थी। जब कालिया नाग के इस कृत्य की जानकारी भगवान श्री कृष्ण तक पहुंची तब उन्होंने कालिया नाग के साथ युद्ध करते हुए उसे यमुना छोड़ने पर विवश कर दिया और पाताल लोक भेज दिया।

श्री कृष्णा की महिमा

इस तरह भगवान श्री कृष्ण ने भयंकर विषधर के भय से आम लोगों को मुक्त कराया। कहते हैं इसी कारण बृज क्षेत्र के लोगों ने श्रावण मास की पंचमी तिथि को नाग देवता की पूजा कर उसे नागपंचमी का नाम दिया। भारतवर्ष की पृष्ठभूमि पर मनाया जाने वाला नागपंचमी का पर्व अत्यंत प्राचीन पर्व है। वाराह पुराण में आई कथा के अनुसार श्रावणमास शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को ब्रह्माजी ने शेषनाग को पृथ्वी धारण करने का आशीर्वाद प्रदान किया था।

एक अन्य कथानक

एक समय नागों की माता कद्रु ने सभी प्रकार के सर्पों को श्राप दिया कि भविष्य में तुम सभी राजा जनमेजय के द्वारा आयोजित यज्ञ के हवन कुण्ड में जलकर भस्म हो जाओगे। नाग माता के ऐसे श्राप को सुनकर सारे सर्प ब्रह्मा जी की शरण में पहुंचे और श्राप मुक्त होने का उपाय पूछने लगे। ब्रह्माजी ने उन्हें आशीर्वाद देते हुए कहा कि यायावर वंश में उत्पन्न ऋषि जरत्कारु तुम्हारे बहनोई के रूप में प्राप्त होंगे। इसीलिए इस तिथि से नागपंचमी पर्व का आरंभ माना जाता है। नाग पंचमी का पर्व यूनान, चीन, जापान सहित अनेक देशों में प्राचीनकाल से मनाया जा रहा है। यह पर्व नागों के प्रति मानव हृदय में प्रेम उत्पन्न कर उन्हें सम्मान दिलाता आ रहा है।

पर्वतीय प्रदेशों में नाग पंचमी

नाग पंचमी का पर्व पर्वतीय प्रदेशों में अधिक उत्साह के साथ मनाया जाता है। भारतवर्ष के गांवों और शहरों में ग्राम देवता के रूप में नागों के मंदिर स्थापित हैं, तो लोक देवता के रूप में नागों को पूजा स्थलों में स्थान प्रदान किया गया है। भारतीय संस्कृति में सुबह-शाम पूजन के समय अपने इष्टदेव की आराधना के साथ अनंत तथा वासुकि आदि पवित्र नागों का स्मरण भी किया जाता है। इन नागों के स्मरण से नागविष और नागों के भय से रक्षा होना बताया गया है। नागों के स्मरण से संबंधित मंत्र भी उच्चारित किए जाने की प्रथा अनेक क्षेत्रों से मिलती है।

नाग पंचमी की एक अन्य कथा

एक समय की बात है, एक सेठजी के सात पुत्र थे। सातो के विवाह हो चुके थे। सबसे छोटे पुत्र की पत्नी श्रेष्ठ चरित्र की विदुषी और सुशील थी, परंतु उसका कोई भाई नहीं था। एक दिन बड़ी बहू ने घर लीपने को पीली मिट्टी लाने के लिए सभी बहुओं को साथ चलने को कहा तो सभी डलिया और खुरपी लेकर मिट्टी खोदने लगीं। तभी वहां एक सर्प निकला, जिसे बड़ी बहू खुरपी से मारने लगी। यह देखकर छोटी बहू ने उसे रोकते हुए कहा ‘मत मारो इसे? यह बेचारा निरीह है’।

सर्प की एक और कथा

यह सुनकर बड़ी बहू ने उसे नहीं मारा तब सर्प एक ओर जा बैठा। तब छोटी बहू ने उससे कहा ‘हम अभी लौट कर आती हैं, तुम यहां से जाना मत’। यह कहकर वह सबके साथ मिट्टी लेकर घर चली गई और वहाँ कामकाज में फँसकर सर्प से जो वादा किया था उसे भूल गई। उसे दूसरे दिन वह बात याद आई तो सब को साथ लेकर वहाँ पहुँची और सर्प को उस स्थान पर बैठा देखकर बोली – सर्प भैया नमस्कार!

सर्प की बहन

कुछ दिन व्यतीत होने पर वह सर्प मनुष्य का रूप धारण कर उसके घर आया और बोला कि ‘मेरी बहिन को भेज दो’। सबने कहा कि ‘इसके तो कोई भाई नहीं था, तो वह बोला – मैं दूर के रिश्ते में इसका भाई हूँ, बचपन में ही बाहर चला गया था। उसके विश्वास दिलाने पर घर के लोगों ने छोटी को उसके साथ भेज दिया। उसने मार्ग में बताया कि ‘मैं वही सर्प हूँ, इसलिए तू डरना नहीं और जहां चलने में कठिनाई हो वहां मेरी पूंछ पकड़ लेना। उसने कहे अनुसार ही किया और इस प्रकार वह उसके घर पहुंच गई। वहाँ के धन-ऐश्वर्य को देखकर वह चकित हो गई।

ठंडे की जगह गरम दूध

एक दिन सर्प की माता ने उससे कहा -मैं एक काम से बाहर जा रही हूँ, तू अपने भाई को ठंडा दूध पिला देना। उसे यह बात ध्यान न रही और उसने गर्म दूध पिला दिया, जिसमें उसका मुख बेतरह जल गया। यह देखकर सर्प की माता बहुत क्रोधित हुई। परंतु सर्प के समझाने पर चुप हो गई। तब सर्प ने कहा कि बहिन को अब उसके घर भेज देना चाहिए। तब सर्प और उसके पिता ने उसे बहुत सा सोना, चाँदी, जवाहरात, वस्त्र-भूषण आदि देकर उसके घर पहुँचा दिया।

सर्प बड़ा धनवान

इतना ढेर सारा धन देखकर बड़ी बहू ने ईर्ष्या से कहा – तेरा भाई तो बड़ा धनवान है, तुझे तो उससे और भी धन लाना चाहिए। सर्प ने यह वचन सुना तो सब वस्तुएँ सोने की लाकर दे दीं। यह देखकर बड़ी बहू ने कहा – ‘इन्हें झाड़ने की झाड़ू भी सोने की होनी चाहिए’। तब सर्प ने झाडू भी सोने की लाकर रख दी।

सर्प बड़ा धनवान

इतना ढेर सारा धन देखकर बड़ी बहू ने ईर्ष्या से कहा – तेरा भाई तो बड़ा धनवान है, तुझे तो उससे और भी धन लाना चाहिए। सर्प ने यह वचन सुना तो सब वस्तुएँ सोने की लाकर दे दीं। यह देखकर बड़ी बहू ने कहा – ‘इन्हें झाड़ने की झाड़ू भी सोने की होनी चाहिए’। तब सर्प ने झाडू भी सोने की लाकर रख दी।

नाग की प्रार्थना

छोटी बहू को यह बात बहुत बुरी लगी, उसने अपने सर्प भाई को याद किया और आने पर प्रार्थना की – भैया! रानी ने हार छीन लिया है, तुम कुछ ऐसा करो कि जब वह हार उसके गले में रहे, तब तक के लिए सर्प बन जाए और जब वह मुझे लौटा दे तब हीरों और मणियों का हो जाए। सर्प ने ठीक वैसा ही किया। जैसे ही रानी ने हार पहना, वैसे ही वह सर्प बन गया। यह देखकर रानी चीख पड़ी और रोने लगी।

सर्प और राजा

यह देख कर राजा ने सेठ के पास खबर भेजी कि छोटी बहू को तुरंत भेजो। सेठजी डर गए कि राजा न जाने क्या करेगा? वे स्वयं छोटी बहू को साथ लेकर उपस्थित हुए। राजा ने छोटी बहू से पूछा- तूने क्या जादू किया है, मैं तुझे दण्ड दूंगा। छोटी बहू बोली – राजन ! धृष्टता क्षमा कीजिए, यह हार ही ऐसा है कि मेरे गले में हीरों और मणियों का रहता है और दूसरे के गले में सर्प बन जाता है। यह सुनकर राजा ने वह सर्प बना हार उसे देकर कहा – अभी पहनकर दिखाओ। छोटी बहू ने जैसे ही उसे पहना वैसे ही हीरों-मणियों का हो गया।

सर्प की बहन पर संदेह

तब उसी समय सर्प ने प्रकट होकर कहा – यदि कोई मेरी धर्म बहिन के आचरण पर संदेह प्रकट करेगा तो मैं उसे खा लूँगा। यह सुनकर छोटी बहू का पति बहुत प्रसन्न हुआ और उसने सर्प देवता का बड़ा सत्कार किया। उसी दिन से नागपंचमी का त्यौहार मनाया जाता है और स्त्रियाँ सर्प को भाई मानकर उसकी पूजा करती हैं।

इस मंदिर में सिर्फ नाग पंचमी पर खुलते हैं द्वार

हिन्दू धर्म की परंपराओं के तहत भारत में संभवत मध्यप्रदेश की धार्मिक नगरी उज्जैन स्थित नाग चन्द्रेश्वर मंदिर एकमात्र ऐसा देवालय है, जिसके पट प्राचीन परंपराओं के अनुसार वर्ष में केवल एक दिन के लिये नागपंचमी पर्व के दिन ही खुलते हैं। यह मंदिर भारत के द्वादश ज्योतिर्लिंगों में प्रमुख और प्रसिद्ध महाकालेश्वर मंदिर के विशाल परिसर में सबसे ऊपर तीसरे खंड में स्थित है।

परमारकालीन सुन्दर प्रतिमा

11वीं शताब्दी के इस मंदिर में शिव पार्वती नाग पर आसीन परमारकालीन सुन्दर प्रतिमा है और छत्र के रूप में नाग का फन फैला हुआ है। यह मंदिर प्रतिवर्ष नागपंचमी पर्व के दिन ही आम दर्शनार्थियों के लिए खोला जाता है। बताया जाता है कि नागपंचमी के दिन इस प्रतिमा के दर्शन के बाद ही भक्तजन वर्ष में एक बार नागचन्द्रेश्वर महादेव के दर्शन करते हैं।

नागचन्द्रेश्वर का मंदिर

प्राचीन परंपरा अनुसार यह एकमात्र ऐसा भगवान नागचन्द्रेश्वर का मंदिर है जो भारतीय संस्कृति के अनुसार वर्ष में केवल श्रावण शुक्ल की पंचमी के दिन आम दर्शनार्थियों के लिए खोला जाता है। 60 फुट ऊंचाई पर स्थित इस मंदिर तक नागपंचमी के पर्व के दिन श्रद्धालुओं के दर्शन के लिये पहुंचने हेतु पुराने समय में एक-एक फुट की सीढ़ियां बनाई गई थीं जिसका रास्ता संकरा और छोटा था।

सर्प को दूध पिलाने से उसकी जान को खतरा

नाग पंचमी के दिन नाग देवता को अमूमन दुग्ध का सेवन कराया जाता है पर वास्तव में यह सरासर गलत है क्यूंकि इससे उनकी जान जाने का खतरा मंडराता है। वस्तुतः सर्प के लिए दुग्ध जैसा पदार्थ विष का काम करता है। धर्म के नाम पर ऐसा करना कितना सही है, कमेंट के माध्यम से अपनी राय अवश्य साझा करें।

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