पर्यावरण की रक्षा को उच्च प्राथमिकता

पर्यावरण की रक्षा को उच्च प्राथमिकता

हिन्दू धर्म की प्रमुख विशेषताओं में पर्यावरण की रक्षा भी एक बेहद खास विषय है। प्राचीन वेद-पुराणों से लेकर आध्यात्मिक गुरुओं ने भी पर्यावरण की रक्षा पर बल दिया है। पर्यावरण के संरक्षण को आम जनता के लिए सुगम बनाने के लिए ही विभिन्न पेडों और नदियों को पूजनीय होने का दर्जा दिया गया है।

ऐसी की पेड़ों की सुरक्षा सुनिश्चित 

हिन्दू धर्म में नीम, बेल, तुलसी, बरगद, पीपल, आंवला, आम आदि वृक्षों एवं पौधों को पूजा-अर्चना के साथ जोड़ा गया है। हिन्दू धर्म के अनुसार जहां पीपल के पौधे पर देवताओं का वास माना गया है तो वहीं तुलसी को विष्णु जी की प्रिया बताया गया है। दरअसल दंतकथाओं और किस्सों से हिन्दू धर्म के संस्थापकों ने यह सुनिश्चित करने का प्रयास किया है कि आने वाली पीढ़ी इन पेड़ों के महत्व को समझ सके।
अब तो विज्ञान भी इस बात की पुष्टि कर चुका है कि तुलसी और आंवले जैसे पौधे एंटीबैक्टीरयल होते हैं। इनके औषधीय ग़ुणों की कथा हिन्दू धर्म के पवित्र ग्रंथों और पुराणों में वर्षों पहले दर्ज किया जा चुका है।

नदियों को देवी का दर्जा 
गंगा, यमुना और सरस्वती नदी की भूमिका, गुण, उपयोग और संरक्षण से संबंधित कई तथ्य वेदों में दर्ज हैं। हिन्दू पुराणों में भी नदियों के संरक्षण को अहम स्थान दिया गया है। श्री राम जी का भगवान होते हुए समुद्र से पुल बनाने का निवेदन करना, श्री कृष्ण जी का लोगों को यमुना और गोवर्धन पर्वत की महिमा और उनकी पूजा करने की आज्ञा देना आदि ऐसी कई कथाएं हैं जो हिन्दू धर्म के पर्यावरण प्रेमी पक्ष को सामने रखती हैं।

सबसे बड़ी धरती मां 
पेड़-पौधों, जानवरों, नदियों आदि के साथ हिन्दू धर्म ग्रंथों में सबसे बड़ा स्थान प्रकृति या पृथ्वी देवी को दिया गया है। धरती को सभी जीवों की जननी माना गया है। ऐसा कर यह सुनिश्चित करने का प्रयास किया गया है कि आने वाली पीढ़ी के मन में धरती मां के प्रति और कर्तव्य की भावना  रहेगी।
इस प्रकार सूर्य, चन्द्रमा, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी, नदी आदि को देवत्व प्रदान कर उनकी पूजा की जाती हैं। पूजा कर लोगों के मन में पर्यावरण के लिए आदर का भाव जगाने की कोशिश की हई है। पर्यावरण संरक्षण को हिन्दू धर्म मात्र पढ़ने या जानने की वस्तु नहीं रखता बल्कि जीवन में विभिन्न कार्यों द्वारा इसे प्रैक्टिकल जीवन में उतारने की भी कोशिश की गई है।

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