रत्न-उपरत्न

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हीरा (american diamond)

Price : 1500 850

हीरा को महारत्न की श्रेणी में रखा गया है। यह संसार का सर्वाधिक चमकीला और सम्मोहक रत्न है। हीरा सभी रत्नों की अपेक्षा कठोर होता है। हीरा सभी पदार्थों को खुरच सकता है परन्तु इसे कोई नहीं खुरच सकता। वाराहमिहिर ने हीरे को वज्रमणि नाम से सम्बोधित किया है। सौन्दर्य, टिकाऊपन और दुर्लभता के कारण यह अधिक कीमती माना गया है। भारतीय हीरा सर्वोत्तम माना गया है जो कि विश्व में सबसे अधिक कीमत वाला होता है।शुक्र के शुभ प्रभाव को बढ़ाने के लिए हीरा धारण करना लाभदायक माना गया है। निम्न स्थितियों में हीरा धारण करना आवश्यक हो जाता है: Û जब शुक्र शुभ भावेश हो और अपने भाव से 6, या 8वें घर में उपस्थित हो। Û जब शुक्र कुंडली में नीच राशि में हो, वक्री हो, अस्त, हो या पाप ग्रहों के प्रभाव में हो। Û उपर्युक्त स्थिति के शुक्र की महादशा, या अंतर्दशा चल रही हो। जिन व्यक्तियों को विषैले जीव-जंतुओं के बीच में रहना पड़ता हो। Û व्यापारिक प्रतिनिधि, फिल्मी अभिनेता एवं अभिनेत्रियां, फिल्म निर्माता तथा किसी भी कला क्षेत्र से जुड़े हुए व्यक्ति तथा प्रेमी-प्रेमिका भी इसे धारण कर लाभ ले सकते हैं। Û भूत-प्रेत व्याधि से पीड़ित व्यक्ति भी हीरा धारण कर लाभ ले सकते हैं। शुद्ध हीरे को गर्म पानी, गर्म दूध, या तेल में डालने पर यह उसे ठंडा कर देता है। शुद्ध हीरे पर किसी भी वस्तु की खरोंच का चिह्न नहीं बन सकता। दोषयुक्त हीरा कभी धारण न करें। जो हीरा धूम्र वर्ण हो, जो मुख पर लाल, या पीला हो, उसे धारण करें। हीरे पर किसी प्रकार की रेखा, बिंदु, या कटाव नहीं होना चाहिए। अंगूठी में जड़ने के लिए कम से कम एक रत्ती वजन का हीरा होना चाहिए। वैसे जितना अधिक वजन का हीरा धारण किया जाएगा, उतना अच्छा परिणाम प्राप्त होगा। हीरे के साथ माणिक्य, मोती, मूंगा और पीला पुखराज न पहनें। एक बार धारण किये हुए हीरे का प्रभाव 7 वर्ष तक रहता है। उसके बाद उसे पुनः विधिवत दूसरी अंगूठी में धारण करना चाहिए। हीरे को चांदी, या प्लैटिनम में दाहिने हाथ की कनिष्ठिका (सबसे छोटी अंगुली) में शुक्रवार को प्रातः काल धारण किया जाना चाहिए। अंगूठी निर्माण करते समय शुक्र वृष, तुला, या मीन राशि में हो, अथवा शुक्रवार के दिन भरणी, पूर्वाषाढ़, पूर्वाफाल्गुनी में से कोई भी नक्षत्र हो, तब यह अंगूठी निर्माण कर धारण करनी चाहिए। अंगूठी निर्माण के बाद उस अंगूठी की पूजा, प्राण प्रतिष्ठा, हवन आदि क्रिया करने के पश्चात, शुक्रवार को, प्रातःकाल, पूर्व दिशा की ओर मुंह कर के, धारण करनी चाहिए। यदि ऐसा करना संभव न हो, तो शुक्र के पौराणिक मंत्र ‘ऊं शुं शुक्राय नमः’ की एक माला जप कर उपर्युक्त मुहूर्त में अंगूठी धारण की जा सकती है। स्त्रियों को हीरा धारण करने का निषेध मिलता है। इस संबंध में शुक्राचार्य ने कहा है: ‘न धारयेत् पुत्र कामानारी वज्रम कदाचनः।’ अर्थात पुत्र की कामना रखने वाली स्त्री को हीरा नहीं पहनना चाहिए। अतः वे स्त्रियां जिनको पुत्र संतान हैं, परीक्षणोपरांत हीरा धारण कर सकती हैं। नियमानुसार धारण किया गया हीरा व्यक्ति को सुख, ऐश्वर्य, राजसम्मान, वैभव, विलासिता आदि देने में पूर्ण सक्षम होता है। लेकिन किसी योग्य दैवज्ञ से कुंडली परीक्षणोपरांत ही हीरा धारण करें। हीरा अपना शुभाशुभ परिणाम शीघ्र देता है। हीरे का प्राप्ति स्थान संसार में सर्वप्रथम दक्षिण भारत के गोलकुण्डा में हीरे की खान मिली थी । आज भी भारत में कई स्थानों पर हीरे की खानें हैं। 1725 में ब्राजील में एक खान का पता चला जिसमें प्राकृतिक हीरे अधिकांश पाये गये। 1867 में दक्षिण अफ्रीका में इसका अधिक उत्पादन पाया गया। सन 1929 में डायमण्ड कार्पोरेशन लि॰ नाम से एक कम्पनी की स्थापना हुई जो कि लंदन में है। अब अधिकांश देशों के हीरे का क्रय-विक्रय इसी कम्पनी से अधिकाधिक होता है।भारत में अनन्तपुर, बेल्लारी, बेलपल्ली, कोठपेटा, वहापा, गुरुपुर, गुंटूर, मड़गला, मुलवरम, पोलिलिट, मालपिल्लि, पेटियाल, कर्नूल, बन्नूर, धोनि, देवनूर, गजेटपिल्ली, उड़ीसा के कालाहंडी, पलमन, खिमा और बिहार में सम्बलपुर के निकट हीरे प्राप्त होते हैं। वर्तमान में सर्वाधिक उत्पादन दक्षिण अफ्रीका में है। तत्व एवं संरचना हीरा शुद्ध कार्बन है इसमें किसी भी अन्य तत्व की मिलावट नहीं है। इसे जलाने पर यह पूरी तरह कार्बन डाईआॅक्साइड बन कर उड़ जाता है। हीरे पर अम्ल का कोई भी असर नहीं पड़ता। रंगीन हीरे को जलाने पर कुछ शेष हिस्सा बच जाता है। हीरे की पहचान हीरों में से कुछ स्वच्छ पारदर्शक और कुछ अपारदर्शक भी पाये जाते हैं। उच्च कोटि के हीरे चिरकाल के प्रयोग के बाद भी नहीं घिसते और न ही खराब होते हैं। अनियमित रूप से बने अनेक दोषपूर्ण हीरे होते हैं। 20 रुक्ष हीरों का तौल मिलकर एक कैरेट होने पर उसे छेद करने के फल बनाने के काम में आता है। काटने वाले कुहीर या रुक्ष हीरे सबसे अधम कोटि के माने जाते हैं। कुहीर का उपयोग कांच को काटने तथा हीरक औजारों को बनाने में किया जाता है। असली हीरे में प्रकाश प्रवेश नहीं कर पाता। पूरा-पूरा वापस आ जाता है। हीरे का दोष हीरे पर जल के समान विन्दु या छींटा होना हीरे को दोषी साबित करता है। कभी-2 हीरे पर काले बिन्दु पाये जाते हैं वे भी दोषी माने जाते हैं। हीरे पर श्वेत, पीला, लाल और काला बिन्दु अशुभ माना जाता है। तेलियापन, जर्दी, कम चमकवाला, खड्डायुक्त हीरा भी दोषी माना जाता है। पाण्डु रंग का, पीले रंग का, रेखाओं वाला, गड्ढ़ो वाला, आदि कई दोष हीरे में पाये जाते हैं, जिन्हें हीरे का दोष माना गया है।

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    • Ratti
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