रत्न-उपरत्न

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लहसुनिया (Cat's Eye)

Price : 7000 4675

लहसुनिया कई रंगों तथा कई प्रकार का प्राप्त होता है कई रंग और कई प्रकार की ही तरह स्थान तथा भाषा भेद के कारण यह रत्न विभिन्न नामों से पुकारा जाता है। लहसुनिया नाम से हिन्दी भाषा में जाना जाने वाला यह मुख्य केतु रत्न संस्कृत में राष्टुक, वैदूर्य, मेधखरांकुर, वायज विडालाक्ष, अभ्ररोह, विदुराज, केतु रत्न, बाल सूर्य बंगला में सूत्र मणि, वैडूर्य मणि, गुजराती लसणियो, बर्मी में चानों, अरबी में अनलहिर, तथा अंगे्रजी में कैट्स आई ;ब्ंजे मलमद्ध नाम से विख्यात है। लहसुनिया प्राप्तिस्थल Û भारत में विन्ध्य तथा सतपुड़ा की घाटियों में प्राप्त होता है। इसके अतिरिक्त भारत में ही त्रिवेन्द्रम के आस-पास भी लहसुनिया का उत्पत्ति स्थल है। यहां प्राप्त होने वाला लहसुनिया सामान्य कोटि का होता है। Û बर्मा की मोगोक खान से प्राप्त होने वाले लहसुनिया को सर्वश्रेष्ठ कहा जाता है। यहां प्राप्त होने वाले लहसुनिया रत्न हल्का पीलापन लिये प्रायः निर्दोष प्राप्त होते हैं।Û श्रीलंका से प्राप्त होने वाला लहसुनिया भी श्रेष्ठ माना गया है। यहां प्राप्त होने वाले लहसुनिया रत्न सुन्दरता, आकर्षण तथा विशेष चमक के होते हैं। Û पश्चिम अफ्रीका के धाना राज्य में भी लहसुनिया रत्न प्राप्त होते हैं यहां प्राप्त होने वाला लहसुनिया भी हल्के पीले रंग का विशेष चमक तथा आभा लिए होता है। यहां प्राप्त होने वाले लहसुनिया को हेम वैदूर्य कहा जाता है। Û अमरीका, ब्राजील, यूराल में प्राप्त होने वाला लहसुनिया रत्न भी उत्तम होता है। Û लहसुनिया कई रंगों में प्राप्त होता है। लेकिन केतु रत्न के रुप में वही लहसुनिया उपयोगी होता हैं, जिसका रंग बिल्ली की आंख की तरह भूरा तथा आकर्षक चमक व कुछ हरी सी आभा लिए हो। तात्विक संरचना लहसुनिया रत्न तन्तुमय पत्थरों से काटकर निर्मित किये जाते हैं। लहसुनिया का एक विभेद हेम वैदूर्य वैरिलियम का ऐल्यूमिनेट होता है। सभी लहसुनिया रत्न पेग्माइट नाइस एवम् अंबरकयुक्त परतदार शिला खण्डों से प्राप्त होते हैं। पहाड़ियों से बहने वाले प्राकृतिक नालों से भी लहसुनिया प्राप्त किये जाते है। लहसुनिया की परख Û लहसुनिया देखने में कांचकीय आभा का आभास देता है, लेकिन पीछे की ओर देखने पर पत्थर होने का स्पष्ट प्रभाव दिखाई देता है। Û असली लहसुनिया में सफेद धारियां जैसी दिखाई देती हैं, इन्हें ब्रह्मसूत्र कहा जाता है। Û असली लहसुनिया को इधर-उधर घुमाने से इसमें उपस्थित धारियां भी साथ ही साथ हिलती प्रतीत होती हैं। Û असली लहसुनिया पीतवर्णी हरी आभा युक्त बिल्ली की आंख जैसा दिखाई देता है। Û लहसुनिया अपने रंग-रूप कठोरता आदि के आधार पर चार विभिन्न प्रकारों का माना गया है। लहसुनिया के दोष सुन्न दोष- चमकहीन लहसुनिया सुन्नदोष से पीड़ित कहा गया है। ऐसा चमक रहित लहसुनिया धारण नहीं करना चाहिए। ज्योतिष विद्वानों का विचार है कि ऐसा लहसुनिया धन नष्ट कराने में सहायक होता है। खड्ड दोष- किसी भी प्रकार के गड्ढे या छिद्र से युक्त अथवा चिटका, टूटा लहसुनिया भी धारण करने योग्य नहीं होता। कहा जाता है कि ऐसा खड्ड युक्त लहसुनिया धारण करने वाला व्यक्ति अपने लिए शत्रु उत्पन्न करता है, तथा उनकी ओर से भयाक्राँत पीड़ा प्राप्त करता है। चीरक दोष- लहसुनिया में क्रास जैसा चिन्ह भी रत्न को दोष युक्त बनाता है। ऐसा लहसुनिया भी शत्रुभय बढ़ाने वाला माना गया है। रक्त बिन्दु दोष- लहसुनिया में यदि लाल रंग के बिन्दु जैसे दिखाई दें तो ऐसे लहसुनिया को भी दोषपूर्ण मानकर धारण नहीं करना चाहिए। कहा जाता है कि ऐसा लहसुनिया धारण करने वाला व्यक्ति कारावास का दण्ड भोगता है।ज्वाला दोष- यदि किसी लहसुनिया रत्न में ज्वाला जैसा चिन्ह दिखाई दे ऐसा लहसुनिया भी दोषयुक्त माना गया है। ज्वाला दोष युक्त लहसुनिया को धारण करने योग्य नहीं माना जाता। विद्वान ऐसे लहसुनिया को पत्नी के लिए घातक बताते हैं। श्रेष्ठ धारण योग्य लहसुनिया Û श्रेष्ठ लहसुनिया ही धारण करना चाहिए। श्रेष्ठ लहसुनिया बिल्ली की आंख के समान रंग वाला पीत तथा हरित आभा से युक्त होता है। Û श्रेष्ठ लहसुनिया वह है, जो विशेष चमक वाला, आकर्षक तथा बाहर निकलती किरणों से युक्त हो। Û श्रेष्ठ लहसुनिया उसे ही समझना चाहिए जो दाग, धब्बों रहित तथा ऊपर वर्णित दोषों से मुक्त हो। Û खुरदरा लहसुनिया श्रेष्ठ नहीं होता। चिकना तथा हाथ में लेने पर फिसलने वाला लहसुनिया रत्न ही श्रेष्ठ होता है। Û श्रेष्ठ लहसुनिया हाथ में लेने पर आकार से अपेक्षाकृत कम भारी प्रतीत होता है।

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