रत्न-उपरत्न

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पुखराज (Yellow Sapphire)

Price : 71000 51000

पुखराज’ गुरु गुणों वाला रत्न माना गया है। पुखराज पीला, लाल तथा सफेद रंगों में भी पाया जाता है तथा इसे दिव्य गुणों वाला रत्न भी माना गया है। इसकी परख के लिए अगर कांच के गिलास में गाय का दूध भर कर इसे डाल दें, तो एक घंटे बाद पुखराज के रंग की किरण ऊपर सतह तक जाती प्रतीत होती है। इसे गुरुवार को दिन में सुवर्ण अंगूठी में, धनु, अथवा मीन लग्न में धारण करना चाहिए। आकाश तत्वों को स्वयं में संजोये रखने वाला ग्रह गुरु-व्यक्ति की बुद्धि को प्रभावित करने में सक्रिय भूमिका निभाता है। गुरू को बृहस्पति नाम से भी पुकारा जाता है। लेखन, प्रकाशन, तंत्र-मंत्र, वेद-शास्त्र, विवेक, सदाचार, तथा सौम्य-व्यवहार आदि का कारक भी गुरू ही है। पुखराज एक अत्यन्त आकर्षक तथा तेजस्वी रत्न है। दोष रहित खूबसूरत पुखराज देखने मात्र से आंखों को एक सुख, शांति का आभास जैसा होता है। बृहस्पति ग्रह का यह मुख्य रत्न पुखराज, स्थान तथा भाषा भेद के अनुसार संस्कृत में पुष्पराग, बल्लभ, गुरु रत्न, गुरु बल्लभ, गुजराती में पीलूराज, बंगला में पोखराज, कन्नड़ में पुष्पराग, पंजाबी में फोकज, बर्मी में आउटफिया, फारसी में याकूत, हिन्दी में पुखराज तथा अंग्रेजी में यलोसफायर नाम से पुकारा जाता है। पुखराज प्राप्ति स्थल Û भारत में असली पुखराज प्राप्त नहीं होता। पीले नीलम अथवा पीले स्फटिक को ही पुखराज कह कर जौहरी बेच देते हैं। Û ब्राजील ही ऐसा एक मात्र स्थान है, जहां से दुनिया भर में सबसे अधिक और उत्तम कोटि का पुखराज प्राप्त होता है। ब्राजील का पुखराज प्रायः पीले कनेर पुष्प के रंग वाला अत्यधिक आबदार होता है तथा सफेद भी मिलता है। Û यूराल पर्वत श्रेणी से भी पीत तथा सफेद आभा वाले पुखराज प्राप्त किए जाते हैं। Û श्री लंका में खानों प्राप्त होने वाले पुखराज पीले, सफेद तथा अन्य मिश्रित रंगों में भी होते हैं। Û बर्मा में तवाय नामक स्थान पर पुखराज निकाले जाते हैं। यह पुखराज प्रथम श्रेणी के नहीं होते। बर्मा के पुखराज अधिकतर सफेद ही होते हैं और कभी-कभी देखने में विक्रान्त अथवा हीरक खण्ड का आभास देते हैं।तात्विक संरचना पुखराज एक खनिज पत्थर है। रसायनविदों के अनुसार यह एल्यूमिनियम, फ्लोरीन तथा हाइड्रोक्सिल तत्वों से निर्मित एक सिलीकेट मात्र है। पुखराज को सिलीकेट में जल तथा कुछ अन्य अशुद्धियों के कारण ही विभिन्न रंग देखने को मिलते हैं। पुखराज का शुद्ध सिलीकेट पूर्णरूपेण स्वच्छ जल के समान पारदर्शक सफेद होता है यह सिलीकेट ही सफेद पुखराज के नाम से जाना जाता है। लेकिन गुरु‘रत्न के रूप में पीला पुखराज ही मान्य है। पीले पुखराज में पीलापन फ्लुओंसिलीकेट में किसी प्रकार की अशुद्धियों के कारण ही जन्म लेता है। लेकिन यह अशुद्धि ही पुखराज को गुरु-रत्न के रूप में प्रतिष्ठित करती है। श्वेत पुखराज ज्ञानवर्धक, लाल पुखराज शक्तिवर्धक, तथा पीला पुखराज सुख और धनवर्धक माने गये हैं। पुखराज की परख Û पुखराज एक ऐसा रत्न है, जिसे खरीदने में प्रायः धोखाधड़ी का सामना करना पड़ता है। उड़ीसा की एक नदी में पीले रंग का स्फटिक प्राप्त होता है। इस स्फटिक को पुखराज बताकर अधिकांश जौहरी ग्राहकांे को बेच देते हैं। अतः पुखराज खरीदते समय विशेष जांच परख आवश्यक है। Û पुखराज हाथ में लेने पर विशेष स्वर्ण के समान भार की अनुभूति होती है। Û शुद्ध पुखराज की पहचान करने के लिए उसे गरम करें तो नकली पुखराज अपने पूर्व रंग को त्याग करके नितान्त श्वेत वर्ण का हो जाता है। Û गोमूत्र तथा दुग्ध के मिश्रण में पुखराज डाल कर रात भर रख दें। सुबह निकालने पर यदि पुखराज में रंग परिवर्तन हो या चमक कम हो जाये तो पुखराज नकली समझना चाहिए। Û असली पुखराज को यदि सूर्य की रोशनी में देखा जाये तो आने वाली किरणें सीधी न होकर वक्री होती हैं। पुखराज के दोष Û दूधक युक्त पुखराज जीवन के लिए घातक माना गया है। ऐसा पुखराज धारण करने योग्य नहीं होता। Û आभाहीन पुखराज कभी भी धारण नहीं करना चाहिए। यह स्वास्थ्य के लिए कष्टप्रद होता है। Û रक्तवर्ण धब्बा युक्त पुखराज भी धारण योग्य नहीं होता। Û दो रंग वाला पुखराज धारण करने वाला व्यक्ति संतान बाधा का शिकार होता है। Û दूध जैसे रंग का पुखराज भी अशुभ माना गया है। इसे धारण नहीं करना चाहिए।

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    • Ratti
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