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श्री संपूर्ण महालक्ष्मी यन्त्र

इस यंत्र को निरंतर धन वृद्धि के लिए अधिक उपयोगी माना गया है। महालक्ष्मी यंत्र अत्यन्त दुर्लभ एवं लक्ष्मी प्राप्ति के लिए रामबाण प्रयोग है तथा अपने आप में अचूक, स्वयं सिद्ध तथा ऐश्वर्य प्रदान करने में सर्वथा समर्थ है। यह स्वर्ण वर्षा करने वाला यंत्र कहा गया है। निरन्तर धनवृद्धि के लिए इस यंत्र के सामने ’कनकधारा स्तोत्र’ का पाठ करना चाहिए। महालक्ष्मी यंत्र व्यापार वृद्धि, दारिद्र्य नाश करने व ऐश्वर्य प्रदान करता है। दीपावली के शुभ अवसर पर सिंह लग्न में इस यंत्र को सम्मुख रखकर धूप, दीप आदि द्वारा पूजन करने के पश्चात श्री सूक्त और कनक धारा को सम्पुटित करके सोलह पाठ, महालक्ष्मी का पूजन करने से माता लक्ष्मी वर्ष पर्यंत भक्तगणों को अनुग्रहीत करती हैं। मधुर बोलने वाला, कर्तव्यनिष्ठ, ईष्वर भक्त, कृतज्ञ, इन्द्रियों को वष में रखने वाले, उदार, सदाचारी, धर्मज्ञ, माता-पिता की भक्ति भावना से सेवा करने वाले, पुण्यात्मा, क्षमाषील, दानषील, बुद्धिमान, दयावान और गुरु की सेवा करने वाले लोगों के घर में लक्ष्मी का स्थिर वास होता है। अधिक सुख-समृद्धि पाने के लिए भगवती के किसी भी मंत्र को कमल गट्टे, अथवा लाल चंदन की माला पर यथाशक्ति जप करना चाहिए। 1. श्रीं ह्रीं क्लीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं महा लक्ष्म्यै नमः। 2. ऊं श्री महालक्ष्म्यै स्वाहा। 3. ¬ ह्रीं श्रीं क्लीं महालक्ष्म्यै नमः।।

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श्री सन्तानगोपाल यन्त्र

मानव जीवन में सफलता प्राप्त करने के लिए एक अच्छे संतान की आवश्यकता होती है। परन्तु-कुछ लोग संतान विहीन होते हैं और संतान की प्राप्ति के लिए अनेक प्रयास करते हैं। ऐसी स्थिति में संतान प्राप्ति हेतु यह यंत्र अत्यन्त चमत्कारिक है। इस यंत्र की प्रतिष्ठा पूजा करने से मनोवांछित संतान की प्राप्ति होती है और वह दीर्घायु तथा गुणवान होता है। संतान गोपाल यंत्र की साधना अत्यन्त प्रसिद्ध है जिन्हें संतान नहीं उत्पन्न होती है वे बालकृष्ण की मूर्ति के साथ संतान गोपाल यंत्र स्थापित करते हैं तथा उनके सामने संतानगोपाल स्तोत्र का पाठ करते हैं। कुछ लोग ’पुत्रोष्टि यज्ञ’ करते हैं पुत्रेष्टि यज्ञ एवं संतान गोपाल यंत्र के द्वारा अवश्य ही संतान की प्राप्ति होती है। संतान गोपाल यंत्र को गुरुपुष्य नक्षत्र में पूजन एवं प्रतिष्ठा करने के पश्चात् संतान गोपाल स्तोत्र का पाठ करने से शीघ्र ही गृह में कुलीन एवं अच्छे गुणों से युक्त संतान की उत्पत्ति होती है। माता पिता की सेवा में ऐसी संतानें हमेशा तत्पर रहती हैं। संतान गोपाल यंत्र को गोशाला में प्रतिष्ठित करके गोपालकृष्ण का मंत्र का जप श्रद्धापूर्वक करने से वंध्या को भी शीघ्र ही पुत्ररत्न उत्पन्न होता है तथा सभी गुणों से सम्पन्न होता है। मंत्र: ॐ क्लीं श्रीं ह्रीं जीं ओं भूर्भुवः स्वः ॐ देवकीसुतगोविंद वासुदुदेवेवजगत्पते।े। देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः ॐ¬ स्वः भुवः भूः जीं हृीं श्रीं त्वीं अ

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श्री यन्त्र

सनातन धर्म संस्कृति में विभिन्न कामनाओं की पूर्ति हेतु विभिन्न यंत्रों की साधना का विधान है। इन यंत्रों का उपयोग ध्यान केंद्रित करने के लिए किया जाता है। ये यंत्र एक दूसरे से भिन्न होते हैं। इनमें श्रीयंत्र सर्वाधिक शक्तिशाली है और इसे यंत्रराज की संज्ञा दी गई है। श्रीयंत्र में सभी देवी देवताओं का वास होता है। इसे विचारशक्ति, एकाग्रता तथा ध्यान को बढ़ाने के लिए सर्वाधिक उपयुक्त माना गया है। श्रीयंत्र का प्रयोग ध्यान में एकाग्रता के लिए किया जाता रहा है। आधुनिक वास्तुशास्त्रियों ने माना है कि इस यंत्र के गणितसूत्र के आधार पर बनाए गए मंदिर, आवास या नगर में अत्यधिक सकारात्मक ऊर्जा होती है तथा ऐसे स्थान में रहने वाले लोगों में विचारशक्ति, ध्यान, शांति, सहानुभूति, सौहार्द व प्रेम के गुणों का उद्भव होता है। श्रीयंत्र आद्याभगवती श्रीललितमहात्रिपुर सुंदरी का आवास है। इसकी रचना तथा आकार के बारे में आदिगुरु शंकराचार्य की दुर्लभकृति सौंदर्यलहरी में बड़े रहस्यमय ढंग से चर्चा की गई है। महालक्ष्मी को सभी देवियों में श्रेष्ठ माना जाता है और श्रीललितामहात्रिपुर सुंदरी भगवती महालक्ष्मी का श्रेष्ठतम रूप है। श्रीयंत्र ¬ शब्द ब्रह्म की ध्वनितरंगों का साकार चित्र है। ऐसा कहा जाता है कि जब ¬ का उच्चारण किया जाता है तो आकाश में श्रीयंत्र की आकृति उत्पन्न होती है। भारत का सर्वश्रेष्ठ और सर्वाधिक पूजनीय यंत्र श्रीयंत्र ही है। यह समूचे ब्रह्मांड का प्रतीक है जिसे श्री चक्र भी कहा जाता है। जन्म कुंडली में सूर्य ग्रह के पीड़ित होने पर श्रीयंत्र की पूजा का विधान शास्त्रों में वर्णित है। श्रीयंत्र शब्द की उत्पŸिा श्री और यंत्र के मेल से हुई है। श्री शब्द का अर्थ है लक्ष्मी अर्थात संपŸिा। इसलिए इसे संपŸिा प्राप्त करने का यंत्र भी कह सकते हैं। श्रीयंत्र की अधिष्ठात्री देवी भगवती श्रीललितामहात्रिपुरसुंदरी हैं। संसार की सर्वाधिक सुंदर व श्रेष्ठतम वस्तु को ललिता कहा जाता है। ललिता शब्द का शाब्दिक अर्थ है- वह जो क्रीड़ा करती है। सृष्टि, स्थिति व विनाश को भगवती की क्रीड़ा कहा गया है। त्रिपुर शब्द का अर्थ है- तीन लोक, त्रिशक्ति, त्रिदेव, सत् चित् आनंदरूप, आत्मा-मन-शरीर इत्यादि। इसका शाब्दिक अर्थ है त्रिशक्तियों-महाकाली, महालक्ष्मी व महासरस्वती से पुरातन। भगवती श्रीललितामहात्रिपुरसुंदरी को दशमहाविद्याओं में श्री विद्या नाम से जाना जाता है। इनके 16 अक्षरों के मंत्र को भी श्री विद्या नाम से ही पुकारा जाता है। इनके यंत्र को श्रीयंत्र कहा जाता है। तात्पर्य यह कि श्री व श्रेष्ठता की उच्चतम अभिव्यक्ति श्रीविद्या पराम्ना षोडशी भगवती राजराजेश्वरी श्रीललितामहात्रिपुरसंदरी ही श्रीयंत्र की अधिष्ठात्री शक्ति हंै। इनके बारे में कहा गया है कि कोटि-कोटि जिह्नाएं भी इनके माहात्म्य का वर्णन नहीं कर सकती हैं। ब्रह्मपुराण में इनकी साधना के बारे में कहा गया है कि जिसने अनेक जन्मों में कठोर साधना की हो, उसी को श्री विद्या की उपासना का सौभाग्य मिलता है। इनके महत्व के बारे में कहा गया है- यत्रास्ति भोगो नहि तत्र मोक्षो। यत्रास्तिमोक्षो नहि तत्रभोगः।। श्री संदुरी सेवन तत्पराणाम्। भोगश्च मोक्षश्च करस्थ एव।। अर्थात् जहां भोग है वहां मोक्ष नहीं है। जहां मोक्ष है वहां भोग नहीं है। परंतु भगवती त्रिपुरसुंदरी की आराधनाकरने वाले भक्तों के लिए भोग और मोक्ष दोनों एक साथ सुलभ होते हैं जबकि ये दोनों एक दूसरे के विरोधी हैं। तंत्र शास्त्र में भगवती त्रिपुरसुंदरी का महत्व सर्वोपरि है। कहा गया है- न गुरोः सदृशो दाता न देवः शंकरोपमः। न कोलात् परमो योगी न विद्या त्रिपुरांदरा।। श्रीयंत्र के मंत्र: श्रीविद्या के बारे में शास्त्रों में कहा गया है कि जिसका अगला जन्म न हो तथा जो इसी जन्म में मुक्त हो या जो स्वयं शंकर हो उसी को श्रीविद्या का मंत्र दिया जा सकता है। यह भी कहा गया है कि ”शिरम् देयम् राज्यम् देयम् न देयम् षोडशाक्षरीम्“ अर्थात् सिर दिया जा सकता है, राजपाट दिया जा सकता है लेकिन श्रीयंत्र का 16 अक्षरों का मंत्र किसी को नहीं दिया जा सकता। श्रीदेव्यऽथर्वशीषम् में कहा गया है- कामोयानिः कमला बज्रपाणिर्गुहा हसा मातीरश्वा भ्रमिंद्रः पुनर्गुहा सकला मायया च पुरुच्यैषाविश्वमातादिविद्योम्। एषा आत्म शक्तिः, एषा विश्वमोहिनी, पाशांकुशधरा एषा श्रीमहाविद्या। य एवम् वेद स शोकम् तरति। ऊपर वर्णित श्लोक में श्री विद्या निहित है। श्रीयंत्र की उपासना में प्रयोग होने वाले मंत्र के छः प्रकार के भावार्थ, लोकार्थ, संप्रदायार्थ इत्यादि लगाए गए हैं। इससे स्पष्ट होता है कि ये मंत्र कितने महत्वपूर्ण व गोपनीय हैं। ज्ञान के अहंकार में मदमस्त होकर बिना गुरु दीक्षा के मंत्र का जप करना विनाशकारी है। इस मंत्र की दीक्षा सुयोग्य संत या आदिगुरु शंकराचार्य द्वारा चार शांकर पीठों में स्थापित गुरुशिष्य परंपरा के अंतर्गत जगद् गुरुशंकराचार्य के आसन पर बैठे संत से ली जा सकती है। इस प्रकार से दीक्षित भक्त श्रीयंत्र की उपासना का पूर्ण फल प्राप्त कर सकता है। जब भगवान शिव ने 64 तंत्रों से समस्त भुवन को भर दिया और उनका मन फिर भी शांत नहीं हुआ, तो उन्होंने सभी पुरुषार्थों की सिद्धि देने वाले श्रीयंत्र व इसकी उपासना की पद्धति को स्वतंत्र रूप से इस पृथ्वी पर उतारा। मंत्रयोग के अनुसार श्रीयंत्र व इसके मंत्र के उच्चारण व निरंतर अभ्यास से कुंडलिनी शक्ति को जाग्रत किया जा सकता है। इसलिए शास्त्रों में इन मंत्रों का बड़ा ही गौरवपूर्ण वर्णन किया गया है। श्रीयंत्र की दीक्षा न मिलने की स्थिति में इसके समक्ष श्रीसूक्त का पाठ करने से सुंदर सुरम्य देह, सरस्वती का विशाल कोष, धन का अक्षय भंडार आदि प्राप्त किए जा सकते हैं। जो लोग दीक्षा नहीं ले सके हों, वे इनके नाम का भजन करके भी इनका अनुग्रह प्राप्त कर सकते हैं। इस श्रीयंत्र व इसकी शक्ति की कितनी भी महिमा गाई जाए, कम है। श्रेष्ठ लाभ के लिए इसे शुद्ध स्थल पर स्थापित करें। सात्विक आहार करें व नियम से पूजा करें, श्रेष्ठ लाभ होगा। धन-संपŸिा, ज्ञान, यश व सौंदर्य प्राप्ति की इच्छा से या ब्रह्म ज्ञान व आध्यात्मिक ज्ञान की प्राप्ति की इच्छा की पूर्ति के लिए श्रीयंत्र की उपासना अत्यंत श्रेयस्कर है। इसके नित्य दर्शन मात्र का अत्यंत शुभ फल लिखा है- महाषोडशदानानानि कृत्वा यल्लभते फलम्। तत्फलं शीघ्रमाप्रोति कृत्वा ‘श्रीचक्रदर्शनम्।। सार्धात्रि कोटितीर्थेषु स्रात्वा यत्फलमश्नुते। लभते तत्फलं सकृत कृत्वा ‘श्रीयंत्र’ दर्शनम्।। लक्ष्मी प्राप्ति के जब सभी उपाय निरर्थक साबित हो जायें तब श्री यंत्र के सम्मुख आदि शंकराचार्य रचित कनकधारा स्तोत्र का पाठ करें इस स्तोत्र के प्रभाव से धन लाभ होता है। षोडशाक्षरी मंत्र: ह्री क ए ई ल ह्री ह स क ह ल ह्री्रीं स क ल ह्री महाषोडशी मंत्र: श्रीं ह्री्री्रीं क्लीं ऐं सौःैः ॐ ह्री क ए ई ल ह्री ह स क ह ल ह्री स क ल ह्री सौःैः ऐं क्लीं ह्री श्रीं।ं।ं।। बिना गुरु दीक्षा के इस मंत्र का जप नहीं करनी चाहिए। यह कुंडलिनी को जागृत करने हेतु बहुत ही प्रभावशाली मंत्र है। यह सुंदरता, संपत्ति और ज्ञान प्राप्ति हेतु श्रेष्ठतम है।

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प्रेम वृद्धि यन्त्र

यह यंत्र पति-पत्नी के बीच प्रेम वृद्धि व आकर्षण के लिए उŸाम है। इस यंत्र की पूजा करने से प्रेम वृद्धि व आकर्षण अवश्य होता है। प्रेमवृद्धि यंत्र को प्रेमी-प्रेमिका, पति-पत्नी आदि के मध्य एक दूसरे के प्रति विशेष प्रेमवृद्धि के लिए उपयोग में लाया जाता है। यंत्र का शुक्रवार अथवा बृहस्पतिवार के दिन रात्रि के समय कच्चे दूध में हल्दी मिलाकर अभिषेक करें तथा गुग्गुल अथवा धूप, दीप, अगरबत्ती से पूजन करके घर की दक्षिण-पूर्व दिशा अथवा पूजा स्थान पर स्थापित करें। इस यंत्र के नित्य दर्शन पूजन करने तथा निम्न मंत्र का जप करने से प्रेमवृद्धि व पति-पत्नी में सामंजस्यता होती है। मंत्र: क्लीं कामदेवाय नमः।

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श्री नव गृह यन्त्र

ग्रहों का हमारे जीवन पर शुभाशुभ प्रभाव पड़ता रहता है, जिसके कारण व्यक्ति का जीवन प्रभावित होता है। सम्पूर्ण नवग्रह यंत्र में सभी ग्रहों के अनुकूल यंत्रों का समावेश है। सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु एवं केतु के यंत्रों का विधिवत पूजन ग्रहों की अनुकूल दृष्टि प्रदान करता है एवं आराधक को हर क्षेत्र में सफलता प्राप्त करने में सहायता करता है। इसे घर, दफ्तर, कारखाना, दुकान आदि में लगाया जा सकता है। उत्तरी क्षेत्र में लगाने से अधिक शुभता प्राप्त होती है। नवग्रह प्रतिकूल होने पर प्रत्येक कार्य में असफलता नजर आती है। यह यंत्र साधक को कुंडली के 12 भावों के गोचर, 9 ग्रहों तथा तत्वों की ऊर्जा और सभी दिशाओं का लाभ आदि प्रदान करने के साथ-साथ उसके परिवार के अन्य सदस्यों को भी लाभान्वित करता है। यंत्र को गंगा जल और कच्चे दूध से स्नान कराकरे श्रद्धापूर्वक स्थापित करें और चंदन, दूध, धूप, दीप, नैवेद्य आदि से पूजा करें। अपने इष्ट देव का स्मरण कर निम्नलिखित नवग्रह मंत्र का नवरत्न माला पर 108 बार जप करे। ॐ ब्रह्म्रह्ममुरुरारीः त्रिपुरुरान्तकारी भानुःुः शशीः भूूिमिसुतुतो बुध्ुधश्च गुरूुरूश्च शुक्रुक्रः सर्र्वेे ग्रह्रहाः शान्तिकरा भवन्तु।ु।।

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सुख़ समृधि यन्त्र

व्यापार, विदेश गमन, राजनीति, गृहस्थ जीवन, नौकरी पेशा आदि के कार्य में इस यंत्र का उपयोग करने से सुख एवं समृद्धि प्राप्त होती है। जिन लोगों में अनेक तरह की भ्रान्तियां उत्पन्न होती हैं, घर में निरन्तर क्लेश रहता हो तथा आपसी सम्बन्धों में कटुता उत्पन्न हुयी हो तो यह यंत्र उन लोगों के लिए वरदान स्वरूप साबित होता है। इस यंत्र की पूजा उपासना करने से उन्हें मानसिक शान्ति एवं सहिष्णुता में वृद्धि होती है। जब वाहन, मकान, नौकरों से कोई न कोई तकलीफ रहती हो व्यापार, व्यवसाय में भयानक उतार चढ़ाव आते हो तथा घाटा होता हो तो ऐसी स्थिति में व्यापारिक एवं व्यवसायिक स्थिति अनुकूल होने के लिए इस यंत्र की पूजा उपासना करना उचित होगा। यदि आपका भाग्य निर्बल है, हर संभव प्रयास करने पर भी नौकरी नहीं लगती, परीक्षा या साक्षात्कार में असफलता का मुंह देखना पड़ता है तो इस यंत्र का उपयोग लाभदायक है। अथक परिश्रम करने के बाद भी वांछित सफलता जिन्हें नहीं मिलती तथा कार्यो में असफलता मिलती है। बार-बार अपयश का सामना होता है। तो ऐसी स्थिति में यह यंत्र अत्यन्त लाभकारी है इस यंत्र की चल अचल दोनों प्रतिष्ठा होती है। इस यंत्र के सम्मुख लक्ष्मी और गणेश का सम्पुटित मंत्र जप करने से सुख समृद्धि प्राप्त होती है तथा अकारण हुये अपमान का शत्रु प्रायश्चित करता है और जीवन पर्यन्त सम्मान प्रदान करता है। मंत्र: ॐ मंगलमूर्तर्यये नमः।

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श्री लक्ष्मी गणेश यन्त्र

अगर आप जीवन में सफलता व संपत्ति का स्वप्न देखते हैं, तो यह स्वप्न आप का लक्ष्मी गणेश यंत्र पूरा कर सकता है, क्योंकि इस यंत्र को देवी लक्ष्मी व भगवान का आशीर्वाद प्राप्त है। इस यंत्र की पूजा आप को अत्यंत फल देती है।भगवान गणेश व देवी लक्ष्मी की संयुक्त शक्ति आप को मुश्किल दौर से बाहर लाने में मदद करती है। इस यंत्र का स्वामि शुक्र है, जो आप को जीवन में आगे लेकर जाने में मदद करता है। इससे आप जीवन में शोहरत हासिल करते हैं। इससे आप का आर्थिक पक्ष भी सुधरता है।अगर आप जीवन में स्थायी और अच्छी आर्थिक स्थिति व प्रसन्नता का आनंद लेना चाहते हैं तो आप को अभ्यस्त व सक्रिय लक्ष्मी गणेश यंत्र लेना चाहिए एवं उसकी पूजा अर्चना करनी चाहिए। यह लाभकारी यंत्र आप हम से भी खरीद सकते हैं। हम आप को विश्वसनीय व प्रमाणित यंत्र उपलब्ध करवाने के अलावा पूजा व स्थापना विधि भी उपलब्ध करवाएंगे।

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व्यापार वृद्धि यन्त्र

कोई भी व्यापार हो अगर उसमें बार-बार हानि हो रही है। चोरभय, अग्नि भय इत्यादि बार-बार परेशान करता हो अथवा किसी अन्य प्रकार से व्यापार में बाधा उत्पन्न होती हो तो यह यंत्र वहां प्रतिष्ठित करने से शीघ्र ही व्यापार वृद्धि एवं लाभ होता है। इस यंत्र को काम्यकर्म अर्थात कामनापूर्ति के लिए स्थापित किया जाता है इस यंत्र को सम्मुख रखकर भिन्न- भिन्न कामनाओं के लिए पृथक्-पृथक् वस्तुओं से होम करने का विधान शास्त्रों में वर्णित है, उन-उन वस्तुओं से होम करने से तत्-तत् कामनाएँ पूर्ण होती हैं। व्यापार वृद्धि यंत्र को पूजा प्रतिष्ठा करने के पश्चात् व्यापार से सम्बन्धित ब्रह्मस्थल में स्थापित किया जाता है और हमेशा पूजा की जाती है ऐसा करने से रुके व्यापार में वृद्धि होती है तथा धन का आगमन होता है। व्यापार में निरन्तर घाटा होने की स्थिति में इस यंत्र को सम्मुख रखकर व्यापार वृद्धि का दस हजार ऋद्धि- सिद्धि मंत्र जपने से शीघ्र ही व्यापार में लाभ होता है। इस यंत्र की अचल प्रतिष्ठा करके व्यक्ति को अपने पास रखने से अनेक तरह से व्यापार में लाभ होता है। प्रतिकूल रहने वाले व्यक्ति भी अनुकूल हो जाते हैं और अनेक प्रकार से लाभ प्रदान करने के लिए आतुर होने लगते हैं तथा निरन्तर व्यापार में लाभ होता जाता है। मंत्र: ॐ गं गणपतये नमः।

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श्री बगलामुखी महायंत्र

बगलामुखी आठवीं महाविद्या हैं। इनका वास्तविक नाम बल्गामुखी है। एक बार सतयुग में संपूर्ण सृष्टि को नष्ट कर देने की क्षमता रखने वाला भंयकर तूफान आया। प्राणियों की रक्षा के लिए भगवान विष्णु ने सौराष्ट्र देश में हरिद्रा सरोवर के बीच तपस्या की। उस दिन मंगलवार को चतुर्दशी तिथि में अर्धरात्रि के समय माता बगला प्रकट हुईं। माता ने स्तंभन क्रिया के द्वारा समस्त विश्व को स्तंभित कर दिया था जिससे विश्व की रक्षा हो सकी। इनके शिव एकवक्त्र रुद्र हैं। कलियुग में इनकी पूजा आराधना बहुत अधिक हो रही है। इनके मंत्र के जप से शत्रु का सर्वनाश हो जाता है। व्यक्ति रूप में शत्रुओं क¨ नष्ट करने वाली समष्टि रूप में परमात्मा की संहार शक्ति ही बगला है। इनकी साधना शत्रु भय से मुक्ति अ©र वाक् सिद्धि के लिए की जाती है। पीतांबरा माला पर विधि -विधान के साथ जप करें। दस महावद्याओं में बगला मुखी सबसे अधिक प्रय¨ग में लाई जाने वाली महाविद्या है, जिसकी साधना सप्तऋषियों ने वैदिक काल में समय समय पर की है। इसकी साधना से जहां घ¨र शत्रु अपने ही विनाष बुद्धि से पराजित ह¨ जाते हैं वहां साधक का जीवन निष्कंटक तथा ल¨कप्रिय बन जाता है। इस यंत्र द्वारा शत्रुओं पर विजय व वांछित सफलता प्राप्त हो सकती है। मंत्र: ॐ ह्री बगलामुुिुिखि सर्वर्दर्ददुष्ुष्टानां वाचं मुख्ुखं पदं स्तम्भय। जिव्हाम् कीलय कीलय बुुि िविनाशय ह्री्री ॐ स्वाहा।।

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महामृतुन्जय यन्त्र

यह यंत्र मानव जीवन के लिए अभेद्य कवच है, बीमारी अवस्था में एवं दुर्घटना इत्यादि से मृत्यु के भय को यह यंत्र नष्ट करता है। डाक्टर, वैद्य से सफलता न मिलने पर यह यंत्र मनुष्य को मृत्यु से बचाता है। शारीरिक एवं मानसिक पीड़ा को नष्ट करता है। इसे चल, अचल दोनों तरह से प्रतिष्ठित किया जा सकता है। महामृत्युंजय यंत्र को सम्मुख रखकर रुद्र सूक्त का पाठ करने से अनोखा लाभ होता है और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से रुद्रसूक्त के मंत्रों में रश्मि विज्ञान के आधार पर गूढ़ रहस्य छुपे हैं, जिसे खोजने के लिए शुद्ध वैज्ञानिक मस्तिष्क चाहिए। महामृत्युंजय यंत्र उच्चकोटि का दार्शनिक यंत्र है जिसमें जीवन-मृत्यु का रहस्य छिपा हुआ है। महामृत्युंजय यंत्र भगवान मृत्युंजय से सम्बन्धित है जिसका शाब्दिक अर्थ स्पष्ट है कि मृत्यु पर विजय। इस देवता की आकृति देदीप्यमान है तथा यह नाना प्रकार के रूप धारण करने वाला है। यह सब औषधि का स्वामी है तथा वैद्यों में सबसे बड़ा वैद्य है, यह अपने उपासकों के पुत्र-पौत्रादि (बच्चों) तक को आरोग्य व दीर्घायु प्रदान करता है। इसके हाथों को ’’मृणयाकु’’ (सुख देने वाला) ’’जलाष’’ (शीतलता, शांति प्रदान करने वाला ) तथा ’’भेषज’’ (आरोग्य प्रदान करने वाला) धारण कहा गया है। यंत्र के मध्य स्थापित महामृत्युंजय यंत्र के चारों ओर अन्य यंत्र स्थापित कर इसकी शक्ति में वृद्धि की गई है। इसकी साधना से साधक को रोग से मुक्ति मिलती है और स्वास्थ्य उत्तम रहता है। इसमें स्थापित अन्य यंत्रों की अपनी-अपनी महिमा है। मंत्र: ॐ त्रयम्बकम् यजामहे सुगुगन्धिम्पुुिष्टिवर्धर्ननम् उर्वार्रूरूकमिवबन्धनान् मृत्योमेर्र्मुुक्षर््क्षीयमा{मृतात्

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वास्तु दोष निवारण यन्त्र

भाद्रपद मास के कृष्णपक्ष की तृतीया तिथि, शनिवार, कृतिका नक्षत्र, व्यतीपात योग, विष्टि, करण, भद्रा के मध्य में कुलिक मूहूर्त में वास्तु की उत्पत्ति हुई उसके भयंकर गर्जना से चकित होकर ब्रह्मा ने कहा जो भी व्यक्ति ग्राम, नगर, दुर्ग, मकान, प्रासाद, जलाशय, उद्यान के निर्माणारम्भ के समय मोहवश आपकी उपासना नहीं करेगा या आपके यंत्र को स्थापित नहीं करेगा वह पग-पग बाधाओं का सामना करेगा और जीवन पर्यंत अस्त-व्यस्त रहेगा। मकान, दुकान, कम्पनी, धर्मशाला, मन्दिर और मोटरगाड़ियों में भी वास्तु का निवास होता है। अगर किसी कारण स्थान निर्माण में वास्तु दोष उत्पन्न होता है तो वास्तु देवता को प्रसन्न एवं सन्तुष्ट करने के लिए अनेक उपाय किये जाते हैं। जिनमें वास्तु यंत्र सरल एवं अधिक उपयोगी है इस यंत्र को स्थापित करने से वास्तु दोष का निवारण होता है तथा उस स्थान में सुख समृद्धि का वर्चस्व होता है। इस यंत्र को चल या अचल दोनों प्रकार से प्रतिष्ठित किया जाता है। प्रत्येक वर्ष यज्ञादि में, पुत्र जन्म पर, यज्ञोपवीत, विवाह, महोत्सवों में, जीर्णोद्धार, धान्य संग्रह में, बिजली गिरने से टूटे हुए घर में, अग्नि से जले हुए घर पर, सर्प व चांडाल से घिरे हुए घर पर, उल्लू और कौआ सात दिन तक जिस घर में रहते हैं, जिस घर में रात्रि में मृत वास करें, गौ व मार्जार गर्जना करें, हाथी, घोड़े विशेष शब्द करें और जिसमें स्त्रियों के झगड़े होते हों, जिस घर में कबूतर रहते हों और अनेक प्रकार के उत्पात होते हों वहां वास्तुयंत्र अवश्य स्थापित करें। मंत्र: ॐ वास्तुपुरुषाय नमः।

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श्री सर्वकार्य सिद्ध यन्त्र

किसी विशेष कार्य को करने के लिए लोगों में अनेक संशय उत्पन्न होते हैं कार्य सफल होगा या असफल होगा ऐसी भावनायें बार-बार मन में उठती हैं। कई बार कार्य असफल भी होते हैं। ऐसे कार्यों को निर्धारित समय में बिना किसी परेशानी के सफलता पाने के लिए यह यंत्र अत्यन्त उपयोगी है। व्यापार, विदेश गमन, राजनीति, गृहस्थ जीवन, नौकरी पेशा आदि में इस यंत्र का उपयोग करने से सुख एवं समृद्धि प्राप्त होती है। जब समाज तथा नौकरों से कोई न कोई तकलीफ रहती हो व्यापार व्यवसाय में भयानक उतार चढ़ाव आते हों तथा घाटा होता हो तो ऐसी स्थिति में व्यापारिक एवं व्यवसायिक स्थिति अनुकूल होने के लिए इस यंत्र की पूजा उपासना करना उचित होगा। अथक परिश्रम करने के बाद भी वांछित सफलता जिन्हें नहीं मिलती तथा कार्यो में असफलता मिलती है। बार-बार अपयश का सामना होता है तो ऐसी स्थिति में यह यंत्र अत्यन्त लाभकारी है। इस यंत्र की चल एवं अचल दोनों प्रतिष्ठा होती है। इस यंत्र के सम्मुख सिद्धि विनायक मंत्र जप करने से सुख समृद्धि प्राप्त होती है। आकरण हुये अपमान का शत्रु प्रायश्चित करता है और जीवन पर्यन्त सम्मान प्रदान करता है। मत्रं: सर्वार्बर्बबाधाविनिर्मुकर््ुकर््ुक्तो धनधान्य सुतुतुतान्वितः मनुष्ष्ष्योमेमेमत्प्रस्रस्रसादेनेनेन् भविष्यति न संशयः।

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श्री राम रक्षा यन्त्र

यह यंत्र विशेष प्रभावशाली यंत्र है। इस यंत्र को संपूर्ण परिवार की रक्षा के लिए स्थापित किया जाता है, भगवान मर्यादा पुरुषोतम राम की कृपा से साधक पर हर पल कृपा दृष्टि बनी रहती है। मन में संशय, भय, मोह का नाश होता है तथा व्यक्ति निर्भय होकर अपने कार्य क्षेत्र में सफल हो जाता है। व्यापक ब्रह्म निरंजन, निरगुन विगत विनोद। सोइ अज प्रेम भगति वस, कौशल्या की गोद।। उस परमसŸाा के मनुष्य रूप में अवतरित होने का मुख्य कारण प्रेम भक्ति है। राम शब्द सभी धर्मों का मूल है। कलियुग में मनुष्य की उम्र इतनी कम रह गई है कि वह यज्ञ, जप, तप आदि नहीं कर सकता है। ऐसे में राम का नाम लेने मात्र से इन सब का फल मिल जाता है। जो लोग कलिकाल में श्रीराम नाम का आश्रय लेते हैं, उन्हें कलियुग उन्हें बाधा नहीं पहुंचाता। तुलसी ‘रा’ के कहत ही, निकसत पाप पहार। पुन आवन पावत नहीं, देत मकार किवार।। राम बोलते समय ‘रा’ कहते ही हमारा मुंह खुलता है और हमारे अंदर स्थित पाप निकल जाते हैं। ‘म’ का उच्चारण करते ही मुंह बंद हो जाता है और पाप पुनः प्रवेश नहीं कर पाते हैं। शीघ्र फल प्राप्ति के लिए इस यंत्र के सम्मूख बैठकर श्रद्धा विश्वास से रामरक्षा स्तोत्र का पाठ करने से विशेष शुभ फल की शीघ्र प्राप्ति होती है। मंत्र: ॐ श्री राम जय राम जय जय राम।

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श्री हनुमान यन्त्र

हनुमान् देवता प्रोक्तः सर्वाभीष्टफलप्रदः। श्रीहनुमान् जी भगवान् श्रीराम के भक्त हैं। इनका जन्म वायुदेव के अंश से और माता अंजनि के गर्भ से हुआ है। श्रीहनुमान् जी बालब्रह्मचारी महान् वीर अत्यन्त बुद्धिमान्, स्वामिभक्त हैं। हनुमान जी सकल भय, व्याधि, पीड़ा, अपशकुनों के हरणकर्ता हैं। उनकी कृपा से सभी अमंगलों का नाश व जीवन मंगलमय होता है। इस यंत्र को मंगलवार के दिन अपने घर पर स्थापित करके श्रद्धा-भक्ति पूर्वक दर्शन-पूजन करें। यंत्र के दर्शन और मंगलमय यात्रा की प्रार्थना करके घर से निकलें। हनुमान यंत्र पौरुष को पुष्ट करता है पुरुषों की अनेक बीमारियों को नष्ट करने के लिए इसमें अद्भुत शक्ति पायी जाती है जैसे- स्वप्न दोष, रक्त दोष, वीर्य दोष, मूर्छा, धातु रोग, नपुंसकता आदि को नष्ट करने के लिए यह अत्यन्त लाभकारी यंत्र है। यह यंत्र मनुष्यों को विष, व्याधि, शान्ति, मोहन, मारण, विवाद, स्तम्भन, द्यूत, भूतभय, संकट, वशीकरण, युद्ध, राजद्वार, संग्राम एवं चैरादि द्वारा संकट उपस्थित होने पर निश्चित रूप से इष्टसिद्धि प्रदान करता है। मंत्र: ॐ हनुमते नमः।

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श्री सूर्य यन्त्र

ब्रह्मांड में सूर्य ही सर्वोपरि ग्रह है जिसके इर्द गिर्द सभी सितारे, ग्रह और नक्षत्र घूमते हैं। पृथ्वी के सभी जड़ और चेतन पदार्थों पर इसकी रश्मियों का प्रभाव पड़ता हैं मौसम, वनस्पति, मानव सभी सूर्य किरणों से प्रभावित होते हैं डाॅक्टरों और वैज्ञानिकों की मान्यता है कि उगते हुए सूर्य को, जल के माध्यम से देखने पर नेत्र रोगों को दूर करने में सहायता मिलती है। इसके अशुभ होने पर नेत्र रोग, अस्थि रोग, हृदय रोग, पित्त रोग, ज्वर, मूच्र्छा, चर्म रोग, रक्त स्राव आदि हो सकते हैं। ‘सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च’ वेदों के अनुसार सूर्य संपूर्ण जगत की आत्मा है। सूर्य का हमारे आध्यात्मिक जीवन तथा भौतिक जीवन से घनिष्ठ संबंध है। जीवन में अच्छी आयु-आरोग्यता इसी ग्रह की कृपा से प्राप्त होती है। इस यंत्र को सूर्य ग्रह की शुभता के लिए विशेष रूप से घर में स्थापित करके साधना की जाती है। सामान्यतः इस यंत्र के नित्य दर्शन मात्र से ही लाभ हो जाता है। सूर्य की कृपा से साधक व्यक्ति में आत्म-विश्वास की वृद्धि होकर सर्वत्र यश, सुख, धन की प्राप्ति होती है। सूर्य ग्रह अगर कुंडली में अशुभ या कमजोर स्थिति में हो अथवा सूर्य ग्रह की महादशा/अंतरदशा चल रही हो तो आंख में किसी न किसी प्रकार की पीड़ा या हड्डी संधी रोग होने की संभावना रहती है। ऐसे में इस यंत्र के पूजन से विशेष शांति प्राप्त होती है। आत्म विश्वास में कमी हों, मन बार-बार कुंठित रहता हो, अधिक परिश्रम करने पर भी उत्तम फल न मिलता हो ऐसी स्थिति में इस यंत्र के नत्य दर्शन पूजन से लाभ मिलता है। मत्रं: ॐ ह्रां ह्रीं ह्रौं सः सूर्याय नमः।

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श्री शनि यन्त्र

शनि वायु तत्व, दीर्घ कद का शुष्क ग्रह है। यह शरीर के स्नायु संस्थान, हड्डियों के जोड़, घुटने, पैर, मज्जा और वात को प्रभावित करता है। इसके अशुभ होने पर स्नायु रोग, जोड़ों में दर्द, अपचन, अपराधी प्रवृत्ति, निराशाजनय मानसिक रोग आदि होते हैं। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार शनि प्रतिकूल होने पर अनेक कार्यों में असफलता देता है, कभी वाहन दुर्घटना, कभी यात्रा स्थागित तो कभी क्लेश आदि से परेशानी बढ़ती जाती है ऐसी स्थितियों में ग्रह पीड़ा निवारक शनि यंत्र की शुद्धता पूर्ण पूजा प्रतिष्ठा करने से अनेक लाभ मिलते हैं। यदि शनि की ढै़या या साढ़ेसाती का समय हो तो इसे अवश्य पूजना चाहिए। श्रद्धापूर्वक इस यंत्र की प्रतिष्ठा करके प्रतिदिन यंत्र के सामने सरसों के तेल का दीप जलायें। नीला, या काला पुष्य चढ़ायें। ऐसा करने से अनेक लाभ होगा। मृत्यु, कर्ज, मुकद्दमा, हानि, क्षति, पैर आदि की हड्डी, बात रोग तथा सभी प्रकार के रोग से परेशान लोगों हेतु यंत्र अधिक लाभकारी है। नौकरी पेशा आदि के लोगों को उन्नति शनि द्वारा ही मिलती है अतः यह यंत्र अति उपयोगी है, जिसके द्वारा शीघ्र ही लाभ पाया जा सकता है। मंत्र: ॐ प्रां प्री प्रौं सः शनैश्चराय नमः।

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आकर्षण यन्त्र

इस यंत्र को अपने घर में नित्य पूजा एवं दर्शन करने से आकर्षण शक्ति में वृद्धि होती है। यंत्र को लाल कपड़े में रखकर कमीज की जेब में या पर्स आदि में रखने पर जिस व्यक्ति को आकर्षित करना चाहें, यंत्र के प्रभाव से उसका आकर्षण हो जाता है। 42 दिन तक श्रद्धा, विश्वासपूर्वक ऐसा प्रयोग करने से सफलता प्राप्त होती है। इस यंत्र को शुक्रवार के दिन रात्रि के समय गंगाजल अथवा दूध, दही से अभिषेक करके धूप, दीप से पूजन करके, घर में लाल कपड़े के ऊपर स्थापित करें। शीघ्र फलप्राप्ति के लिए निम्न मंत्र की कम से कम एक माला नित्य जप करें। मंत्र: आकर्षय महादेवि रं मम् प्रियम् हे त्रिपुरे देवदेवेशि तुभ्यम् दश्यामि याचितम्। नोट: मंत्र में अमुक की जगह जिसको आकर्षित करना चाहे उसके नाम का उच्चारण करें।

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श्री शुक्र यन्त्र

शुक्र जल तत्व, मध्यम कद का जलीय ग्रह है। शरीर में यह वीर्य, शुक्राणु, जननेन्द्रिय, स्वर, गर्भाशय, नेत्र एवं संवेग शक्ति को प्रभावित करता है इसके निर्बल एवं अशुभ होने पर वीर्य संबंधी रोग, गुप्त रोग, मूत्र विकार, स्त्री संसर्ग जन्य रोग, नशीले द्रव्यों के सेवन से उत्पन्न रोग, मधुमेह, उपदंश, प्रदर रोग, कफ, वायु विकार रोग होते हैं। शुक्र सांसारिक सुखों का प्रदायक ग्रह है। रूप-सौंदर्य, प्रेम, वासना, धन-संपत्ति तथा दाम्पत्य सुख का कारक ग्रह है। इसके अतिरिक्त नृत्य संगीत, गायन श्रृंगार की वस्तुओं एवं मनोरंजन से जुड़े सिनेमा, टैलिविजन आदि पर इस ग्रह का विशेष प्रभाव है। पुरुषों के लिए यह स्त्री सुख कारक ग्रह है। शुक्र यंत्र की साधना विशेषतया भौतिक सुख, संपदा, धन, ऐश्वर्य की वृद्धि के लिए करनी चाहिए। इस यंत्र के नित्य दर्शन, पूजन से साधक को जीवन में कभी भी भौतिक सुख-संसाधनों की कमी नहीं होती है। वैवाहिक जीवन में दांपत्य सुख की वृद्धि होती है तथा पति-पत्नी के संबंधों में सरसता बनी रहती है। उपयोग: शुक्र ग्रह अशुभ, निर्बल स्थिति में हो, अथवा शुक्र की महादशा/अंतरदशा चल रही हो ऐसे समय में इस यंत्र को अपने घर में स्थापित करके नित्य पूजन, दर्शन से सु,ख, शंति प्राप्त होती है। गृहस्थ सुख में कमी हो, पति-पत्नी का एक दूसरे के प्रति कम आकर्षण रहता हो, ऐसी स्थिति में इस यंत्र की नित्य पूजा करने से लाभ होता है। मंत्र: ॐ द्रां द्रीं द्रौं सः शुक्राय नमः।

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श्री सरस्वती यन्त्र

आज का युग बौद्धिक युग है। बौद्धिक विकास को लेकर चारों तरफ तरह-तरह के परीक्षण, कम्पिटीशन, परीक्षाएं एवं प्रतियोगिताएं संपन्न हो रही हैं। बुद्धि को कुशाग्र करने के लिए, मंदबुद्धि वालों की बौद्धिक क्षमता बढ़ाने के लिए एवं स्मरण-शक्ति की तीव्रता के लिए सरस्वती यंत्र एक मात्र अवलम्बन है, जिससे हम आज के इस बौद्धिक युग में सर्वाधिक सफल व्यक्ति हो सकते हैं। कहते हैं कि महाकवि कालिदास, बदराजाचार्य, वोपदेव आदि मंद बुद्धि के लोग सरस्वती उपासना के सहारे उच्च कोटि के विद्वान बने थे। विद्या प्रदान करने की अपरिमित शक्ति मां सरस्वती में ही है, यह यंत्र मां सरस्वती के बीज मंत्रों द्वारा निर्मित होता है। आज वैज्ञानिक युग में हर किसी को ज्ञान और विद्या की आवश्यकता है। ज्ञान और विद्या विहीन व्यक्ति कभी सफल नहीं हो पाता। अतः हर क्षेत्र के लोगों को यह यंत्र अत्यन्त लाभकारी साबित हो सकता है तथा सफलता के लिए ज्ञान एवं विद्या प्रदान करता है। इस यंत्र को श्रृद्धा पूर्वक विधि के अनुसार पूजन, दर्शन या धारण करता है वह विद्या-संपन्न, धनवान् और मधुरभाषी व सरस्वती की कृपा से ब्रह्मलोक में प्रतिष्ठित होता है। शिक्षा में मन लगे, आपकी बुद्धि प्रखर हो, परीक्षा में सफलता मिले, इस उद्देश्य से सरस्वती यंत्र का पूजा उपासना या धारण करना सर्वश्रेष्ठ है। मंत्र: ॐ ऐं महासरस्वत्यै नमः।

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कालसर्पयोग यंत्र

काल का अर्थ है मृत्यु यदि अन्य ग्रह योग बलवान न हों तो कालसर्प योग में जन्मे मनुष्य की मृत्यु शीघ्र हो जाती है। यदि जीवन रहता है तो मृत्युतुल्य कष्ट भोगता है। जन्म कुण्डली में सभी ग्रह का राहु केतु के मध्य होने से कालसर्प योग होता है। कालसर्पयोग जिसके जन्मांग में है, ऐसे व्यक्ति को अपने जीवन में काफी संघर्ष करना पड़ता है। इच्छित और प्राप्त होने वाली प्रगति में रुकावटें आती हैं बहुत ही विलम्ब से यश प्राप्त होता है। मानसिक, शारीरिक एवं आर्थिक विविध रूप से व्यक्ति परेशान होता है। कालसर्पयोग से पीड़ित जातक दुर्भाग्य से छुटकारा पाने के लिए तथा पूर्व जन्मकृत पापों को नष्ट करने के लिए और पुण्य का उदय होने के लिए इस यंत्र की पूजा प्रतिष्ठा करें ऐसा करने से लाभ प्राप्त होगा। इस यंत्र की विधिपूर्वक सूर्यग्रहण या चन्द्रग्रहण में पूजा प्रतिष्ठा एवं उपयोग करने से कालसर्पयोग का प्रभाव नष्ट हो जाता है और संघर्षमय जीवन में मानसिक एवं शारीरिक शान्ति प्राप्त होती है। मंत्र: ॐ क्लीं मत्स्यरूपाय।

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श्री गणेश यन्त्र

किसी भी शुभ कार्य पर जाने से पूर्व इस यंत्र के दर्शन करें। श्री गणेश सभी कामनाओं की पूर्ति तथा सभी दुखों का हरण करते हैं। इसलिए इनकी पूजा सबसे पहले की जाती है। देवों के देव भगवान् गणपति आदि महाशक्ति के रूप में जाने जाते हैं और प्रथम पूज्यनीय है। विघ्नों के विनाश के लिए ये अत्यन्त प्रसिद्ध हैं। किसी भी क्षेत्र में ऋद्धि-सिद्धि हेतु श्री गणेश यंत्र सदैव लाभ देता है और कार्यो को निर्विघ्न सम्पन्न होने के लिए सहायता करता है। यह यंत्र चल एवं अचल दोनों तरह से प्रतिष्ठित किया जाता है। गणेश विघ्न निवारण के देवता हैं सभी कार्यो में सफलता हेतु गणेश की उपासना सर्वश्रेष्ठ मानी गयी है। चारों वेदों एवं पुराणों में गणेश की श्रेष्ठता का वर्णन बार-बार आता है। विघ्नों को नष्ट करने के लिए गणेश की उपासना आवश्यक है। इस यंत्र को गणेश चतुर्थी अथवा सोमवार, बुधवार और गुरुवार को प्रातः काल के समय गंगाजल से या शुद्ध ताजे जल से अभिषेक करके चंदन या रोली लगाकर, धूप तथा दीप से पूजन करके अपने घर के पूजा स्थल पर स्थापित करें। किसी भी शुभ कार्य पर जाने से पूर्व गणेश यंत्र के सम्मुख खड़े होकर यंत्र को भक्ति भाव से प्रणाम करके मंगल की कामना करते हुए बैठकर निम्न मंत्र की एक माला जप करें। मंत्र: ॐ गं गणपतये नमः।

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राहु यन्त्र

राहु वायु तत्व एवं मध्यम कद वाला ग्रह है। यह शरीर में मस्तिष्क, त्वचा, रक्त तथा वात को प्रभावित करता है। इसके कुंडली में अशुभ होने पर कृमि रोग, मिरगी, उदर रोग, जहरीले जंतुओं का भय, कुष्ठ, कैंसर आदि होते हैं। राहु का संबंध आकस्मिक लाभ तथा आकस्मिक शुभाशुभ घटनाओं से है, राहु व्यक्ति के जीवन में अस्थिरता लाता है। जीवन में स्थिरता न होने से व्यक्ति की उन्नति रूक जाती है। इसके प्रभाव से मानसिक उलझनें एवं शारीरिक अस्वस्थता रहती है। जिन व्यक्तियों के जीवन में बहुत प्रयास करने के पश्चात भी अस्थिरता बनी रहती उनको इस यंत्र के नित्य दर्शन, पूजन से नई चेतना जाग्रत होती है, साहस तथा पराक्रम की वृद्धि होती है। विरोधियों की पराजय होती है। राहु ग्रह निर्बल, तथा अशुभ हो, अथवा राहु की महादशा/अंतर्दशा चल रही हो ऐसी स्थिति में इस यंत्र को श्रद्धा, विश्वास पूर्वक घर में स्थापित करके प्रतिदिन पूजन, दर्शन से शुभ फल की प्राप्ति होती है। परिश्रम करने के पश्चात भी यदि परिश्रम का पूर्ण फल न मिलता हो तथा बार-बार व्यवसाय में परिवर्तन करना पड़ता हो तो ऐसी परिस्थिति में इस यंत्र की नित्य पूजा से मनोवांछित लाभ होता है। कोर्ट-कचहरी आदि के मामलों से होनेवाली परेशानी से वचन के लए यंत्र की घर पर नित्य विधिवत पूजा करने से अनिष्ट फल की शांति होती है। विशेष: शीघ्र फल प्राप्ति के लिए यंत्र में अंकित मंत्र का नित्य एक माला जप करें। मत्रं: ॐ भ्रां भ्रीं भ्रौं सः राहवे नमः।

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श्री केतु यन्त्र

केतु वायु तत्व और ह्नस्व कद वाला ग्रह है। यह शरीर में चर्म, वात तथा रक्त को प्रभावित करता है। इसके अशुभ होने से आलस्य, किसी भी काम में मन न लगना, शरीर पर चोट, वात पीड़ा, अलर्जी, चर्म रोग आदि होते हैं। केतु का संबंध गुप्त विद्या, जासुसी कार्य, तंत्र मंत्र सिद्धि, धार्मिक यात्रा, दुःख, मानसिक शोक संताप शस्त्राघात आदि घटनाओं से विशेष रूप से है। केतु के कारण जीवन में मानसिक संताप, अनावश्यक भय, व्याधि पीड़ा होती है। केतु यंत्र की पूजा विशेषतया मानसिक वेदना तथा अनावश्यक आकस्मिक व्याधियों से बचने के लिए की जाती है। यदि मन बार-बार अशांत रहता हो तो इस यंत्र की प्रतिष्ठा करके नित्य, दर्शन, पूजन करने से मन में शांति बनती है जिससे मानसिक तथा शारीरिक रूप से स्वास्थ्य लाभ होता है। यंत्र का उपयोग: जन्म कुंडली में यदि केतु ग्रह निर्बल अथवा अशुभ हो अथवा केतु की महादशा, अंतरदशा चल रही हो तो ऐसे समय में इस यंत्र को घर में स्थापित करके निष्ठापूर्वक नित्य पूजन, दर्शन से केतु ग्रह की शांति होती है। भूत, प्रेत आदि अशुभ बाधाओं से ग्रसित होने पर इस यंत्र को शनिवार के दिन पूजित करके नित्य अपने पास रखने से इन बाधाओं से रक्षा होती है। यदि किसी बीमारी का डाॅक्टरी इलाज के पश्चात भी पता न लग रहा हो तो ऐसी स्थिति में इस यंत्र के नित्य दर्शन, पूजन से लाभ प्राप्त होता है। विशेष: शीघ्र फल प्राप्ति के लिए यंत्र में अंकित मंत्र का नित्य एक माला जप करने से शीघ्र शुभ फल की प्राप्ति होती है। मंत्रंत्र: ॐ श्रां श्रीं श्रौं सः केतवे नमः।

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वाहन दुर्घटना नाशक यन्त्र

आज के व्यस्त जीवन में हर किसी को वाहन दुर्घटना होने की आशंका बनी रहती है। यह यंत्र साथ में रखने से वाहन दुर्घटना होने से रक्षा होती है तथा अपने निश्चत स्थान के लिए यात्रा तय करने में सरलता होती है एवं यात्रायें सफल होती हैं। इस यंत्र की चल प्रतिष्ठा होती है। दुर्घनानाशक इस शाबर यन्त्र का प्रयोग अमोघ है। नया वाहन खरीदते ही लोग इसे अपने वाहन (ट्रक, बस, कार, स्कूटर) के अगले हिस्से में लगाते हैं तथा उनकी यह मान्यता है कि वायुपुत्र हनुमान की कृपा से वाहन अचानक दुर्घटनाग्रस्त नहीं होते, आई विपत्ति टल जाती है तथा वाहन ठीक समय पर लक्षित स्थान पर पहुंच जाता है। इस प्रकार से यह यन्त्र वाहन के लिए कवच का काम करता है क्योंकि इसके लगाने से वाहन अभिमन्त्रित व सुरक्षित होकर, अनुकूल लाभ देने लग जाता है यह बात पूर्णतः परीक्षित व सत्य है। यह तो सर्व विदित है कि महाभारत में वीरवर अर्जुन के रथ के अग्र भाग पर हनुमान ध्वज व ऐसा ही कोई यन्त्र रहा होगा जिसके कारण सम्पूर्ण युद्ध के दौरान अर्जुन का रथ जरा सा भी क्षतविक्षत नहीं हो पाया। यंत्र का उपयोग किसी भी मंगलवार के दिन हनुमान मंदिर में जाकर इस यन्त्र को मूलमन्त्र से अभिमन्त्रित करके हनुमान जी को भोग आदि लगाकर यंत्र पर लाल पुष्प एवं सिंदूर चढ़ायंे तत्पश्चात् श्रेष्ठ चैघड़िये में यन्त्र को अपने वाहन पर लगावें। मंत्र: ॐ नमो भगवते आंजनयाय महाबलाय स्वाहा ।

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त्रिपुरा भैरवी यन्त्र

इंद्रियों पर विजय और सर्वत्र उन्नति के लिए त्रिपुरभैरवी की उपासना का विधान है। त्रिपुरभैरवी हजारों सूर्यों के समान धवल कांतिवाली हैं और मुंडमाला धारण करती हैं। यह छठी महाविद्या हैं। इनकी उपासना से पद प्रतिष्ठा की प्राप्ति होती है। यह भगवती आद्याकाली का ही रूप है। षट्कर्मों में इनकी उपासना की जाती है। यह कालरात्रि सिद्ध विद्या हैं। इनके शिव कालभैरव हैं। भगवती त्रिपुरभैरवी का संबंध नित्य प्रलय से है। ये निरंतर गतिशील और क्षय होते हुए पदार्थ को गति देती हैं। यह विनाश करने वाले रुद्र की शक्ति हैं। इनके तीन रूप हैं - बाला, भैरवी और सुंदरी। प्रपंचसार नामक ग्रंथ में कहा गया है कि त्रिमूर्ति धारण करने, सृष्टि की स्थिति, पालन तथा लय करने, वेदत्रयी स्वरूपा होने और प्रलयकाल मंे त्रिलोक को लय करने की क्षमता से युक्त होने के कारण इनका नाम त्रिपुरा पड़ा।’’ वाराही तंत्र में लिखा है कि ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर ने इनकी पूजा साधना की थी इसलिए इनका नाम त्रिपुरा रखा गया। त्रिपुर सुन्दरी के अनेक रूप हैं। मसलन, सिद्धि भैरवी, रूद्र भैरवी, कामेष्वरी आदि। जीवन में काम, स©भाग्य अ©र शारीरिक सुख के साथ वषीकरण आर¨ग्य सिद्धि के लिए इस देवी की आराधना की जाती है। कमल पुष्पों से ह¨म करने से धन सम्पदा की प्राप्ति ह¨ती है। मन¨वांछित वर या कन्या से विवाह ह¨ता है। वांछित सिद्धि अ©र मन¨अभिलाषापूर्ति सहित व्यक्ति दुख से रहित अ©र सर्वत्र पूज्य ह¨ता है। मंत्र: हसै हसकरी हसै।

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श्री ब्रहस्पति यन्त्र

गुरु के निर्बल होने पर यकृत रोग, मज्जा रोग, मोटापा, दंत रोग, मस्तिष्क विकार, कर्ण रोग, वायु जन्य विकार, तनाव आदि होते हैं। बृहस्पति ग्रह अध्यात्म, विवेक, ज्ञान तथा परोपकार आदि का कारक है। अध्यात्मिक साधना में सिद्धि के लिए इस ग्रह का विशेष महत्व है, इसके अतिरिक्त पारलौकिक सुख, ज्ञान, विद्या, न्याय, श्रेष्ठ गुण तथा धर्म-कर्म संबंधी कार्यो से इसका धनिष्ठ संबंध है। स्त्री जातक के लिए इस ग्रह से पति सुख का विचार किया जाता है। बृहस्पति यंत्र की साधना मुख्यतः विद्या प्राप्ति, यश, धन एवं आघ्यात्म सुख, शांति के लिए अधिक फलदायी होती है। इस यंत्र के नित्य दर्शन, पूजन से व्यक्ति की अभ्यांतर शक्ति जागृत होती है। जिससे नई चेतना का उदय होता है। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में व्यक्ति बुद्धि विवेक से सफल होते हैं। यदि कन्या के विवाह में विलंब हो रहा हो तो इस यंत्र की नित्य प्रति धूप, दीप से पूजा करें। अध्ययन में बाधाएं आती हों, मन न लगता हो ऐसी परिस्थिति में इस मंत्र की नित्य पूजा से लाभ प्राप्त होता है। विशेष: इस यंत्र में अंकित मंत्र का प्रतिदिन जप करने से शीघ्र कार्य सिद्धि होती है। मंत्र: ॐ ग्रां ग्रीं ग्रौं सः गुरवे नमः।

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श्री वश्यकर यन्त्र

जिस क्रिया के द्वारा स्त्री या पुरुष को वश में करके उससे कर्ता की इच्छानुसार कार्य लिया जाता है, उसे वशीकरण कहते हैं। इसकी अधिष्ठात्री देवी सरस्वती है। अपने से विपरीत कार्य करने वाले को प्रत्यक्ष रूप से या अप्रत्यक्ष कार्य करने के लिए प्रेरित करने की क्रिया को वशीकरण कहते हंै। यह यंत्र स्त्री, पुरुष, वृद्ध, बालक, राजा, मंत्री, सभी तरह के लोगों को आकर्षित करता है और यंत्र धारी को वांछित सफलता प्रदान करता है। अभिचार कर्म से अच्छा है कि शत्रु को वशीकृत कर लिया जावे। इससे प्रथम लाभ तो यह कि दुष्टजन में सुधार आएगा, द्वितीय यह कि कर्ता किसी दोष का शिकार भी नहीं होगा। इस वशीकरण यं़त्र से साधक इस जगत में सर्वप्रिय, लोकप्रिय हो जाता है वह जिस व्यक्ति से मिलता है वह उससे प्रभावित हुये बिना नहीं रह सकता। वशीकरण यंत्र मुख्यतः माँ कामाख्या का ध्यान करते हुए एवं उन्हीं का मंत्र जप करते हुये यंत्र को सिद्ध किया जाता है और उपयोग में लाया जाता है। यंत्र का उपयोग जब पति कुमार्गगामी हो जाए और उसके सुधार के सारे बाह्य प्रयास असफल हो जाएँ तो पत्नी को ऐसे प्रयोगों के माध्यम से पराँम्बा की शरण लेनी चाहिए। इस यंत्र का प्रयोग समाज के किसी भी स्त्री, पुरुष पर किया जा सकता है जब पति-पत्नी के आपसी सामंजस्य कम हो जायें तो ऐसी स्थिति में इस यंत्र का उपयोग अत्यन्त लाभकारी सिद्ध होता है। मंत्र: वशीकरणाय स्वाहा।

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श्री दुर्गा बीसा यन्त्र

तंत्र शास्त्र में बीसा यंत्र का उल्लेख मिलता है। इस यंत्र के कई स्वरूप हैं, ज¨ धन, समृद्धि, वैभव प्राप्ति के लिए, तनाव, कष्ट, विपदाओं से बचने के लिए अ©र र¨ग-व्याधियों से मुक्ति के लिए लाभदायक हैं। इन यंत्रों क¨ शुभ मुहूर्त में शास्त्र¨क्त विधि से तैयार करके अ©र अभिमंत्रित कर सिद्ध करके यदि पूजा, अर्चना की जाए त¨ मन¨कामनाएँ पूर्ण ह¨ती है। बीसा यंत्र क¨ रवि-पुष्य, रवि-हस्त, गुरु-पुष्य, नवरात्रि, धनतेरस, दीपावली या सूर्य-चंद्र ग्रहण में लाभ के च©घड़िए में शास्त्र¨क्त विधि से तैयार किया जाना चाहिए। शुभ मुहूर्त में अनार की डाली त¨ड़कर पत्थर पर घिसकर कलम तैयार करनी चाहिए। इस यंत्र क¨ भ¨जपत्र पर, भ¨जपत्र की अनुपलब्धि में क¨रे कागज पर अष्ट गंध स्याही से अंकित करना चाहिए। इस यंत्र का विधिवत पूजन कर मंत्र¨च्चारण के साथ ध्यान करने पर कार्य सिद्धि तथा विपŸिा निवारण ह¨ता है। धन संपŸिा, व्यापार में सफलता एवं निरंतर उन्न्ाति करने के लिए बीसा यंत्र दीपावली के पूर्व आने वाले पुष्य नक्षत्र में, धनतेरस या दीपावली के दिन लाभ के च©घड़िए में घर, पूजा गृह, मंदिर, दुकान या व्यापार के स्थान पर ईषान क¨ण की पष्चिम मुखी दीवार पर शुद्ध घी-सिंदूर से अंकित करना चाहिए। इससे सुख-समृद्धि एवं वैभव बना रहता है। समस्या, तनाव, विपŸिा दूर करने के लिए तथा शत्रु नाष हेतु निम्नांकित बीसा यंत्रों क¨ विधिवत तैयार करके पूजा-आराधना करनी चाहिए। साथ ही दुर्गा देवी के दुर्गा स्त¨त्र का वाचन शीघ्र लाभ करता है। कहावत है- ‘व¨ करे यंत्र बीसा, ज¨ कर न सके जगदीषा’ मंत्र: ॐ ऐ ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चै।

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श्री महालक्ष्मी यन्त्र

इस यंत्र को निरंतर धन वृद्धि के लिए अधिक उपयोगी माना गया है। महालक्ष्मी यंत्र अत्यन्त दुर्लभ एवं लक्ष्मी प्राप्ति के लिए रामबाण प्रयोग है तथा अपने आप में अचूक, स्वयं सिद्ध तथा ऐश्वर्य प्रदान करने में सर्वथा समर्थ है। यह स्वर्ण वर्षा करने वाला यंत्र कहा गया है। निरन्तर धनवृद्धि के लिए इस यंत्र के सामने ’कनकधारा स्तोत्र’ का पाठ करना चाहिए। महालक्ष्मी यंत्र व्यापार वृद्धि, दारिद्र्य नाश करने व ऐश्वर्य प्रदान करता है। दीपावली के शुभ अवसर पर सिंह लग्न में इस यंत्र को सम्मुख रखकर धूप, दीप आदि द्वारा पूजन करने के पश्चात श्री सूक्त और कनक धारा को सम्पुटित करके सोलह पाठ, महालक्ष्मी का पूजन करने से माता लक्ष्मी वर्ष पर्यंत भक्तगणों को अनुग्रहीत करती हैं। मधुर बोलने वाला, कर्तव्यनिष्ठ, ईष्वर भक्त, कृतज्ञ, इन्द्रियों को वष में रखने वाले, उदार, सदाचारी, धर्मज्ञ, माता-पिता की भक्ति भावना से सेवा करने वाले, पुण्यात्मा, क्षमाषील, दानषील, बुद्धिमान, दयावान और गुरु की सेवा करने वाले लोगों के घर में लक्ष्मी का स्थिर वास होता है। अधिक सुख-समृद्धि पाने के लिए भगवती के किसी भी मंत्र को कमल गट्टे, अथवा लाल चंदन की माला पर यथाशक्ति जप करना चाहिए। 1. श्रीं ह्रीं क्लीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं महा लक्ष्म्यै नमः। 2. ऊं श्री महालक्ष्म्यै स्वाहा। 3. ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं महालक्ष्म्यै नमः।।

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श्री बुध यन्त्र

इसके अशुभ होने से गले के रोग, हिस्टीरिया, चक्कर आना, त्रिदोष ज्वर, टाइफाइड, पांडु, मंदाग्नि, उदर रोग आदि होते हैं। बुध ग्रह का संबंध सौम्यता तथा बुद्धि से है। विशेष रूप से इसका प्रभाव बुद्धि पर रहता है। वर्तमान युग में बुद्धि का और भी महत्व बढ़ गया है। आज जितनी भी विज्ञान ने उन्नति की है वह साखात् मानव बुद्धि का ही चमत्कारिक फल है। बुध यंत्र की साधना विशेषतया निर्मल बंद्धि तथा विद्या के क्षेत्र में सफलता प्राप्त करने के लिए लाभकारी होती है। इस यंत्र के प्रतिदिन दर्शन मात्र से व्यक्ति की बुद्धि कुशाग्र होती है, व्यवहार में सौम्यता की वृद्धि होती है साक्षात्कार आदि में सफलता मिलती है। जीवन में अनावश्यक रूप से बुद्धि भ्रमित नहीं होती है। यंत्र का उपयोग: जन्म कुंडली में यदि बुध ग्रह अशुभ या निर्बल हो अथवा बुध की महादशा अंतरदशा के समय इस यंत्र की अपने घर में नित्य पूजा करने से उत्तम सुख, शांति प्राप्त होती है। साक्षात्कार आदि में सफलता प्राप्त करने के लिए इस यंत्र की नित्य पूजा करने से साक्षात्कार में सफलता मिलती है। विशेष: शीघ्र सफलता के लिए इस यंत्र में अंकित मंत्र का यंत्र के सम्मुख बैठकर नित्य जप करने से मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है। मत्रं: ॐ ब्रां ब्रीं ब्रौं सः बुधाय नमः।

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कनकधारा यन्त्र

इस यंत्र की उपासना से ऋण और दरिद्रता से शीघ्र मुक्ति मिलती है। बेरोजगारों को नौकरी और व्यापारियों के व्यापार में उन्नति होती है। यह यंत्र अत्यंत दुर्लभ परंतु लक्ष्मी प्राप्ति के लिए रामबाण और स्तोत्र अपने आप में अचूक, स्वयंसिद्ध तथा ऐष्वर्य प्रदान करने में समर्थ है। इस यंत्र की उपासना से रंक भी धनवान हो जाता है। परंतु इसकी प्राण प्रतिष्ठा की विधि जटिल है। कथा है कि जगद्गुरु शंकराचार्य ने एक दरिद्र ब्राह्मण के घर इस स्तोत्र का पाठकर स्वर्ण वर्षा कराई थी। इस यन्त्र का उपयोग घर, दूकान, फैक्ट्री, वर्कशाॅप, धन्धे व व्यवसाय स्थल पर कर सकते हैं। दीपावली, होली या शुक्लपक्ष की द्वितीया, नवमी, सप्तमी, दशमी, पूर्णिमा, सोम, बुध, शुक्रवार रोहिणी, पुर्नवसु, हस्त, उत्तराभाद्रपद, उत्तराफल्गुनी नक्षत्र प्राण-प्रतिष्ठा हेतु उत्तम हैं। इस यंत्र के भीतर के त्रिकोण क्रमशः 1. दारिद्रî विनाशक 2. श्रेष्ठ लक्ष्मी एवं 3. ऐश्वर्य के प्रतीत हैं त्रिकोण का मध्य विन्दु मां भगवती (भुवेनेश्वरी) का सूचक है जो अनिष्ट निवारक, प्रसन्नता एवं ऐश्वर्यदायक है। इस बिन्दु पर कमल सिंहासनारूढ़ भगवती श्री लक्ष्मी की परिकल्पना कर, अर्चना करनी चाहिए। इस यंत्र की सिद्धि के लिए निम्नलिखित मंत्र का जप किया जाना चाहिए। मंत्र: ॐ वं श्रीं वं ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं कनकधारायै नमः।

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भुवनेश्वरी यन्त्र

त्रिगुणात्मक शक्ति रूपी नवदुर्गा की एक अ©र विषेषता है, ज¨ कि उनके आध्यात्मिक स्वरूप में दस महाविद्याओं के रूप में विराजमान है। ब्रह्माजी के पुत्र दŸाात्रेय ने तंत्र शास्त्र के निगमागम ग्रंथों की रचना करते हुए महिषासुर मर्दिनी अ©र सिद्धिदात्री देवी भगवती के अंदर समाहित उन दस महाविद्याओं का जिक्र किया है, जिनकी साधना से ऋषि मुनि अ©र विद्वान इस संसार में चमत्कारी शक्तियों से युक्त ह¨ते हैं। मार्कण्डेय पुराण में दस महाविद्याओं का अ©र उनके मंत्रों तथा यंत्र¨ का जिक्र है । देवी दुर्गा के आभामंडल में उपर¨क्त दस महाविद्याएं दस प्रकार की शक्तियों के प्रतीक हैं। सृष्टि के क्रम में चारों युग में यह दस महाविद्याएं विराजमान रहती हैं। दशमहाविद्याओं में से एक भुवनेश्वरी देवी भी है जो अपना एक विशेष महत्व रखती है। इस यंत्र के प्रभाव से व्यक्ति अपने शत्रुओं पर विजय प्राप्त करता है। शत्रु भय नहीं रहता। आदि शक्ति भुवनेश्वरी भगवान शिव के समस्त लीला विलास की सहचरी हैं। मां का स्वरूप सौम्य एवं अंग कांति अरुण हैं। भक्तों को अभय एवं सिद्धियां प्रदान करना इनका स्वाभाविक गुण है। इस यंत्र की आराधना से साधक के अंदर सूर्य के समान तेज और ऊर्जा प्रकट होने लगती है। इनकी साधना से वह संसार का सम्राट भी बन सकता है। इस यंत्र को अभिमंत्रित करने से लक्ष्मी की वर्षा होती है और संसार के सभी शक्ति स्वरूप महाबली चरण स्पर्श करने लगते हैं।

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श्री चन्द्र यन्त्र

चंद्र जल तत्व, दीर्घ कद का ग्रह है। इसके अशुभ प्रभाव से मनोविकार, मूत्र विकार, पीलिया, नाक से संबंधित रोग, कफ, रक्तचाप, चेहरे से संबंधित रोग, जठर अग्नि का मंद होना, स्त्रियों के संसर्ग से उत्पन्न रोग, अतिसार, क्षय रोग आदि होते हैं। ‘चंद्रभामनसोजातः’ वेदों के अनुसार चंद्रमा संपूर्ण प्राणियों के मन का कारक है। इसकी उत्पत्ति विराट पुरुष (परमेश्वर) के मन से हुई है। संपूर्ण जगत के प्राणियों के मन पर इसका प्रभाव पड़ता है, इसके अतिरिक्त चंद्रमा संपूर्ण वनस्पति, औषधियों पर अमृतवर्षा करता है। इस यंत्र की साधना विशेषतया मानसिक सुख शांति तथा आर्थिक समृद्धि के लिए की जाती है। इस यंत्र के नित्य दर्शन से व्यक्ति का मन प्रसन्न रहता है जिससे व्यवहार में भी सरसता आती है तथा जीवन में व्यक्ति अपनी मृदुल प्रकृति से सफल हो जाता है। अगर जन्मकुंडली में चंद्र ग्रह अल्पवली हो अथवा अशुभ हो या चंद्र ग्रह की दशा/अंतरदशा के समय इस यंत्र का नित्य पूजन करने से विशेष लाभ होता है। मन बार-बार अशांत रहता हो तथा किसी कार्य में मन न लगता हो ऐसी परिस्थिति में इस चंद्र यंत्र के नित्य दर्शन, पूजन से शांति प्राप्त होती है। शीघ्र लाभ के लिए इस यंत्र में अंकित मंत्र की नित्य एक माला जप करें। मंत्र: ॐ श्रां श्रीं श्रौं सः चन्द्रमसे नमः।

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श्री गीता यन्त्र

सम्पूर्ण जगत में श्रीमद्भगवद्गीता का पाठ अति लाभप्रद है। गीता पाठ करने वालेां को यंत्र अवश्य ही रखना चाहिए। यंत्र के सम्मुख गीता पाठ करने से सहस्रोगुना अधिक फल मिलता है। पाठ करने में असमर्थता होने पर यंत्र के सम्मुख शुद्ध मन से तुलसी या पंचमुखी रुद्राक्ष की माला पर ऊँ नमों भगवते वासुदेवाय का जप करना चाहिए। यंत्र की नित्य पंचोपचार पूजा आरती करके श्री कृष्ण अराधना भी की जाती है। Û गीता यंत्र पर प्रतिदिन ग्यारह की संख्या में विल्वपत्र अर्पण करने से लक्ष्मी की संतुष्टि होती है तथा लक्ष्मी लाभ होता है। Û गीता यंत्र की नित्य उपासना से मन को शान्ति और ज्ञान की प्राप्ति होती है। स्थिति प्रज्ञ होने के लिए गीता यंत्र की उपासना सर्वोत्तम है। * गीता यंत्र की उपासना से घर के अनेक कलह एवं अशान्ति नष्ट होती है तथा घर में शान्ति का वातावरण बना रहता है। * इस यंत्र की उपासना से भूत, प्रेत एवं पितृ दोष की शान्ति होती है। * गीता यंत्र की उपासना से विद्या प्राप्ति होती है। * शास्त्र ज्ञान चाहने वाले को यह यंत्र शास्त्र का लाभ दिलाता है। मंत्र: ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।

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श्री धूमावती पूजन यन्त्र

धूमावती सातवीं महाविद्या हैं। यह शत्रुनाशक, शत्रु पर विजय दिलने वाली व दुःख को दूर करने वाली देवी हैं। भगवती के इस स्वरूप की साधना से शत्रु पर विजय मिलती है। इन्हें दारिद्र्य की देवी भी माना गया है। अतः इन्हें अलक्ष्मी भी कहा जाता है। यह दारुण विद्या हैं। इनका कोई शिव नहीं है। धूमावती यंत्र को संकटों के निवारण व सुख-समृद्धि का अचूक उपाय माना जाता है। मां धूमावती महाशक्ति स्वयं नियंत्रिका हैं। इनका कोई स्वामी नहीं है। ऋग्वेद में रात्रिसूक्त में इन्हें ‘सुतरा’ कहा गया है, अर्थात् यह सुखपूर्वक तारने योग्य हैं। इन्हें अभाव और संकट को दूर करने वाली मां कहा गया है। इस मंत्र की सिद्धि के लिए तिल मिश्रित घी से होम किया जाता है। धूमावती महाविद्या के लिए यह भी जरूरी है कि व्यक्ति सात्विक, नियम संयम, लोभ लालच से रहित और सत्य निष्ठा का पालन करने वाला हो। इस यंत्र के फल से देवी धूमावती सूकरी के रूप में प्रत्यक्ष प्रकट होकर साधक के सभी रोग, अरिष्ट और शत्रुओं का नाश कर देती हैं। इसके बाद उस साधक की ख्याति प्रबल, महाप्रतापी तथा सिद्धि पुरूष के रूप में हो जाती है। इस यंत्र की नित्य पूजा करने से माता शीघ्र प्रसन्न होती है। मंत्र: धूं धंू धूमावती ठः ठः।

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काली यन्त्र

महाकाली चामुंडा का साक्षात स्वरूप है, जिसने देव दानव युद्ध में देवताओं को विजय दिलवाई है। महाविनाशक महाकाली अपने साधकों को अपार शक्ति देकर सबल और सक्षम बनाती है।दशमहाविद्याओं में काली की प्राथमिकता सर्वत्र देखी जाती है, महाकाली प्रलय काल से सम्बद्ध होने से कृष्णवर्णा हैं। वे शव पर आरूढ़ इसीलिए हैं कि, शक्तिविहीन विश्व मृत ही है। शत्रुसंहारक शक्ति भायावह होती हैं, इसीलिए काली की मूर्ति भयावह है। शत्रु संहार के बाद विजयी योद्धा का अट्टहास भीषणता के लिए होता है, इसलिए महाकाली हँसती रहती हैं। आद्यशक्ति मां महाकाली प्रत्यक्ष या परोक्ष बाधाओं को नष्ट करके शक्ति प्रदान करती है। इस अद्भुत शक्ति द्वारा मानव अनेक सफलता प्राप्त करता है और निश्चिन्त जीवन व्यतीत करता है। इस यंत्र की चल अचल दोनों तरह से प्रतिष्ठा होती है। महाकाली की पूजा सर्वकामनाओं की पूर्ति के लिए की जाती है विशेष रूप से अत्याचारी शत्रु से रक्षा व त्राण पाने के लिए। माया के जाल से छूटकर मोक्ष प्राप्ति के लिए महाकाली की पूजा सर्वश्रेष्ठ है। संसारी जीव असुरों, दुष्टों से रक्षा के लिए मां की पूजा करते हैं। वाद-विवाद, मुकदमें में जीतने के लिए, प्रतियोगिता में प्रतिद्वन्द्वी को परास्त करने के लिए, दौड़, कुश्ती, युद्ध, मल्लयुद्ध, किसी भी प्रकार के युद्ध, शास्त्रार्थ में विजय के लिए काली की उपासना तुरन्त फल देती है। मंत्र: ॐ क्रीं कालिकायै नमः।

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महासुदर्शन यन्त्र

महाकाली चामुंडा का साक्षात स्वरूप है, जिसने देव दानव युद्ध में देवताओं को विजय दिलवाई है। महाविनाशक महाकाली अपने साधकों को अपार शक्ति देकर सबल और सक्षम बनाती है।दशमहाविद्याओं में काली की प्राथमिकता सर्वत्र देखी जाती है, महाकाली प्रलय काल से सम्बद्ध होने से कृष्णवर्णा हैं। वे शव पर आरूढ़ इसीलिए हैं कि, शक्तिविहीन विश्व मृत ही है। शत्रुसंहारक शक्ति भायावह होती हैं, इसीलिए काली की मूर्ति भयावह है। शत्रु संहार के बाद विजयी योद्धा का अट्टहास भीषणता के लिए होता है, इसलिए महाकाली हँसती रहती हैं। आद्यशक्ति मां महाकाली प्रत्यक्ष या परोक्ष बाधाओं को नष्ट करके शक्ति प्रदान करती है। इस अद्भुत शक्ति द्वारा मानव अनेक सफलता प्राप्त करता है और निश्चिन्त जीवन व्यतीत करता है। इस यंत्र की चल अचल दोनों तरह से प्रतिष्ठा होती है। महाकाली की पूजा सर्वकामनाओं की पूर्ति के लिए की जाती है विशेष रूप से अत्याचारी शत्रु से रक्षा व त्राण पाने के लिए। माया के जाल से छूटकर मोक्ष प्राप्ति के लिए महाकाली की पूजा सर्वश्रेष्ठ है। संसारी जीव असुरों, दुष्टों से रक्षा के लिए मां की पूजा करते हैं। वाद-विवाद, मुकदमें में जीतने के लिए, प्रतियोगिता में प्रतिद्वन्द्वी को परास्त करने के लिए, दौड़, कुश्ती, युद्ध, मल्लयुद्ध, किसी भी प्रकार के युद्ध, शास्त्रार्थ में विजय के लिए काली की उपासना तुरन्त फल देती है। मंत्र: ॐ क्रीं कालिकायै नमः।

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श्री गयात्री यन्त्र

गायत्री यंत्र पाप को नष्ट करने और पुण्य को उदय करने की अद्भुद शक्ति का पुन्ज कहा जाता है। इस यंत्र की पूजा उपासना करने से इस लोक में सुख प्राप्त होता है एवं विष्णु लोक में स्थान प्राप्त होता है। अनेक जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं और दिव्य ज्ञान की प्राप्ति होती है। इस यंत्र की अचल प्रतिष्ठा होती है। माँ गायत्री चारों वेदों की प्राण, सार, रहस्य एवं तन (साम) हैं संगीत का यह स्वर आत्मा के उल्लास को उद्वेलित करता है। जो इस तेज को अपने में धारण करता है उसकी वंश परम्परा तेजस्वी बनती चली जाती है। उसकी पारिवारिक संतति और अनुयायियों की श्रृंखला में अनेक तेजस्वी प्रतिभाशाली उत्पन्न होते चले जाते हैं। यंत्र का उपयोग साधना एक ऐसा पुरुषार्थ है जिसमें सामान्य श्रम एवं मनोयोग का नियोजन भी असामान्य विभूतियों एवं शक्तियों को जन्म देता है। साधारण स्थिति में हर वस्तु तुच्छ है। यदि गायत्री यंत्र की उपासना द्वारा उसको पूर्ण बनाया जाय तो वह वस्तु उत्कृष्ट बन जाती है। अनेक मनीषियों ने संसार के कठिन से कठिन कार्य को सदा सहज रूप में कर सकने की सामथ्र्य गायत्री-साधना से ही जुटाई है। हजारों ऋषि-मुनियों, साधकों, महापुरुषों ने इस साधना को बिना सोचे-समझे, बिना प्रयोग-परीक्षण किये नहीं अपनाया है। मंत्र: ॐ भूर्र्भुवः स्वः तत्सवितुवुर्वर्ररेण्ेण्यम् भर्र्गोे देवेवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।

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श्री छिन्नमस्ता यन्त्र

यह पांचवीं महाविद्या है। इनका नाम प्रचंड चंडिका भी है। इन्हें कबंध शिव की महाशक्ति माना जाता है। इनका स्वरूप ऐसे सिर कटे हुए धड़ के रूप में है जो अपने सिर को भी अपने हाथ में लिए हुए है। यह अस्थिमाला धारण करती हैं। भगवान परशुराम इन्हीं विद्या के उपासक थे। गुरु गोरखनाथ ने भी इन्हीं की उपासना की थी। प्रत्येक यज्ञ के अंत में शिरः संधान के लिए जो यज्ञ किया जाता है उसे शिरो यज्ञ कहते हैं। शिरो यज्ञ के बिना यज्ञ मस्तक विहीन रहता है। यज्ञ के इस भाग को सम्राट्याग् प्रवर्गज्ञाग या धर्मयाग कहा जाता है। इस सारी क्रिया का वर्णन श्रुति में इस प्रकार है, ‘‘मैं छिन्न शीर्ष हूं, परंतु अन्न के प्राप्त होने से शिरः संधान यज्ञ से स्व-स्वरूप में प्रतिष्ठित हों।’’ परंतु जब यह शिरः संधान रूपी अन्नगवन बंद हो जाता है तो स्वरूप छिनमस्ता का ही रह जाता है और तब यह छिन्नमस्तारूपी शक्ति संहारक रूप धारण कर लेती हैं। चतुर्थ संध्याकाल में मां छिन्नमस्ता की उपासना से साधक को सरस्वती सिद्ध हो जाती है। पलास और बेल पत्रों से छिन्नमस्ता यंत्र की सिद्धि की जाती है। इनसे प्राप्त सिद्धियां मिलने से लेखन और कवित्व शक्ति की वृद्धि होती है। शरीर रोग मुक्त होता है। शत्रु परास्त होते हैं। योग, ध्यान और शास्त्रार्थ में साधक को संसार में ख्याति मिलती है। इस यंत्र की पूजा से राहु जनित दोषों की भी शांति होती है। मंत्र: ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं वज्र वै रो चनी मे हुं हुं पफट् स्वाहा।।

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श्री मंगल यन्त्र

मंगल ग्रह के अशुभ होने से रक्तचाप, रक्ति विकार, खुजली, फोड़ा-फुंसी, रक्तस्राव, कुष्ठ रोग, आकस्मिक दुर्घटना जन्य रोग, अग्नि भय, गुप्त रोग, सूजन, वात, पित्त संबंधी रोग होते हैं। कार्य सफल होगा या नहीं ऐसी भावनायें बार-बार मन में उठती हैं। कई बार कार्य असफल भी होते हैं। ऐसे कार्यों को निर्धारित करते समय में बिना किसी परेशानी के सफलता पाने के लिए यह यंत्र अत्यन्त उपयोगी है। व्यापार, विदेश गमन, राजनीति, गृहस्थ जीवन, नौकरी पेशा आदि में इस यंत्र का उपयोग करने से सुख एवं समृद्धि प्राप्त होती है। जब वाहन, मकान, नौकरों से कोई न कोई तकलीफ रहती हो व्यापार व्यवसाय में भयानक उतार-चढ़ाव आते हों तथा घाटा होता हो तो ऐसी स्थिति में व्यापारिक एवं व्यवसायिक स्थिति अनुकूल होने के लिए इस यंत्र की पूजा उपासना करना उचित होगा। अथक परिश्रम करने के बाद भी वांछित सफलता जिन्हें नहीं मिलती तथा कार्यों में असफलता मिलती है। बार-बार अपयश का सामना होता है। तो ऐसी स्थिति में यह यंत्र अत्यन्त लाभकारी है। इस यंत्र के सम्मुख सिद्धि विनायक मंत्र का जप करने से सुख समृद्धि प्राप्त होती है तथा आकरण हुये अपमान का शत्रु प्रायश्चित करता है और जीवनपर्यन्त सम्मान प्रदान करता है। मंत्र: ॐ क्रां क्रीं क्रौं सः भौमाय नमः।

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मातंगी पूजन यन्त्र

मातंगी नौवीं महाविद्या हैं। ‘मतंग’ शिव का एक नाम है और मातंगी उनकी शक्ति हैं। मातंगी देवी श्याम वर्णा हैं। इनके मस्तक पर चंद्र हैं। इनके तीन नेत्र हैं और यह रत्नजटित सिंहासन पर विराजमान हैं। इनकी साधना सुखमय गृहस्थ, पुरुषार्थ, ओजपूर्ण वाणी तथा गुणवान पति या पत्नी की प्राप्ति के लिए किया जाता है। इनकी साधना वाममार्गी साधकों में अधिक प्रचलित है, किंतु सात्विक लोग भी दक्षिणमार्गी पद्धति से इनकी साधना करते हैं। चार भुजाएं चार वेद हैं। मां मातंगी वैदिकों की सरस्वती हैं। पलाश अ©र मल्लिका पुष्पों से युक्त बेलपत्रों की पूजा करने से व्यक्ति के अंदर आकर्षण अ©र स्तम्भन शक्ति का विकास ह¨ता है। ऐसा व्यक्ति ज¨ मातंगी महाविद्या की सिद्धि प्राप्त करेगा, वह अपने क्रीड़ा क©षल से या कला संगीत से दुनिया क¨ अपने वष में कर लेता है। वषीकरण में भी यह महाविद्या कारगर ह¨ती है। यह यंत्र गृहस्थ जीवन में परिवारिक सदस्यों के मध्य मधुर संबंध स्थापित करने में प्रभावी है। सास-बहू, ननद-भाभी आदि कुटुंबियों के बीच परस्पर संबंध मधुर बनते हैं। व्यवहार कुशलता में वृद्धि होती है। संगीत की साधना एवं संगीत के क्षेत्र से जुड़े व्यक्तियों के लिए विशेष सफलता एवं उन्नतिदायक होता है। इस यंत्र को सोमवार के दिन सुबह कच्चे दूध से अभिषेक करके घर में पूजा स्थल पर स्थापित करना चाहिए तथा यंत्र के सम्मुख नित्य दर्शन करके अपनी समस्या के अनुसार प्रार्थना करें। शीघ्र फलप्राप्ति के लिए निम्न मंत्र की एक माला जप करें। मंत्रा: ॐ ह्रीं क्लीं हूं मातंग्यै पफट् स्वाहा

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मत्स्य यन्त्र

कुछ व्यक्तियों को कठोर परिश्रम और अपार धन का निवेश करने के बाद भी व्यापार, व्यवसाय में वांछित सफलता नहीं मिल पाती है। एक के बाद एक बाधा का सामना करना पड़ता है। कभी-कभी मकान मालिक, किरायेदार, या परिवार के सदस्यों से, लंबे विवाद, या मुकद्दमे में फंसे रहते हैं। इन सब कष्टों के निराकरण के लिए बाधा मुक्ति किट बहुत उपयोगी है। शत्रुओं पर विजय, मुकद्दमे में जीत, रुके कार्यों में सफलता और बुरी नज़र से बचाव के लिए मत्स्य यंत्र बहुत प्रभावशाली है। इससे जातक का चोट, दुर्घटना, दुर्भाग्य आदि से बचाव होता है। जातक का प्रभा मंडल उज्ज्वल हो जाता है, जिससे वह जिस व्यक्ति से भी कोई कार्य कराना चाहता है, वह उसकी बात मान जाता है। मत्स्य यंत्र को उत्तर, पूर्व, या उत्तर-पूर्व में स्थापित करें। प्रातःकाल, स्नानादि के बाद, यंत्र पर गंगा जल छिड़क कर, उसको स्वच्छ वस्त्र से पोंछ लें। यंत्र को श्रद्धापूर्वक स्थापित करें। इसके सम्मुख घी का दिया जलाएं। यंत्र के पास धूप बत्ती जलाएं। लाल पुष्प अर्पित करें और निम्न मंत्र जप करें। मंत्र: ॐ क्लीं मत्स्यरूपाय।

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कमला यन्त्र

महाविद्या की क्रम परंपरा में माता कमला का स्थान दसवां है। इनका आसन कमल है। इनकी कांति सोने के समान है। श्वेत वर्ण के चार गज अपनी शुंडाओं में जल भरे कलश लेकर इन्हें स्नान कराते हैं। चार भुजाओं वाली इस देवी के एक हाथ में वर, एक में अभय व एक में कमल है। शक्ति के इस विशिष्ट रूप की साधना से जीवन सुखमय होता है और दरिद्रता दूर होती है। यह दुर्गा का सर्व सौभाग्य रूप भी है। जहां कमला हैं वहां विष्णु हैं, जिस साधक के घर ये दोनों हों उसका गृहस्थ जीवन सुखमय होता है। समृद्धि की प्रतीक, स्थिर लक्ष्मी की प्राप्ति, नारी, पुत्रादि के लिए इनकी साधना की जाती है। इस प्रकार दस महामाताएं गति, विस्तर, भरण, प¨षण, जन्म- मरण, बंधन अ©र म¨क्ष की प्रतीक हैं। इस महाविद्या की साधना नदी तालाब या समुद्र में गिरने वाले, जल में आकंठ डूब कर की जाती है। इसकी पूजा करने से व्यक्ति साक्षात कुबेर के समान धनी अ©र विद्यावान ह¨ता है। यष अ©र व्यापार या प्रभुत्व संसार भर में प्रचारित ह¨ जाता है। भगवती कमला के षिव भगवान नारायण गणेष ‘सिद्ध’, बटुक ‘सिद्ध’ तथा यक्षिणी ‘धनदा’ हैं। तंत्र विधानानुसार शक्ति के साथ उक्त चारों शक्तियों का पूजन तथा मंत्र जप करना चाहिए। यह समृद्धि, शुद्धता, पवित्रता की प्रतीक है और दरिद्रता, तनाव, कर्ज व रोग का उन्मूलन करती है। कमला यंत्र को महालक्ष्मी व कनक धारा यंत्र से भी अधिक शक्तिशाली माना गया है। इस यंत्र की उपासना से शुक्र ग्रह को बल मिलता है। इस यंत्र की सिद्धि के लिए निम्नलिखित मंत्र का जप किया जाना चाहिए। मंत्र: ॐ ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं “्सौः जगत्प्रसूत्यै नमः।

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